पतझड़ का मौसम बीता,ये बसंत ऋतु आई है।
सूखी शाखें हुई हरित हैं,ये आम्र मंजरी आई है।
पीत वस्त्र सा ओढ़े ये धरती,मंद मंद मुस्काई है।
रंगबिरंगे फूल खिले हैं,उर में ये खुशियाँ छाई है।
नव यौवन का अनुपम,रूप धरे धरा मुस्काई है।
ऋतु ने किया श्रृंगार है,देखो दुल्हन सी आई है।
नव युगलों के दिलों में,प्यार की बदली छाई है।
ऐसा है ये बसंत मौसम,सबने लिया अंगड़ाई है।
कोयल कूकेगी डाली-2,मन का मयूरा नाचेगा।
पपीहा टेर लगाएगा अब,जंगल में मोर नाचेगा।
सरसो गेहूँ खेत में झूमें,किसान देखके नाचेगा।
अपने फसलों को पकते,देख खुशी से नाचेगा।
शीतल पवन बयार बहे,वन उपवन मुस्काए गा।
कल-2 करती नदियाँ,यह झरने शोर मचाए गा।
नई नवेली दुल्हन के मन,प्रेम पिया का भाएगा।
सजनी होगी साजन संग,विरह भाग ये जाएगा।
परदेशी पिया का प्यारा,अब लो साथ धराए गा।
रूप एवं सौंदर्य सलोना,पिया मिलन कराए गा।
होली के रंगों जैसा यह,सब रूप रंग हो जाएगा।
ऋतु बसंत ये ऐसी है,गोरी तन मन भर जाएगा।
रचयिता :
डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पीबी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.
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