आखिर नैना का विवाह वरुण के साथ तय हो गया। प्रेम विवाह और उसमें में भी अंतर्जातीय विवाह में अक्सर प्रेम का लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं होता है। शिक्षा, समझदारी सब बहुत पीछे रह जाती है। हमारा सामाजिक संगठन ही इस तरह का बना है कि जो कभी भी बच्चों को खुद से अपनी जिंदगी का निर्णय लेने की इजाजत नहीं देता है। कितनी ही प्रेम कहानियाँ ऊंच नीच के भंवर में अपनी जान छोड़ देती हैं। फिर जो अपना प्रेम पा लेते हैं, उन्हें तो खुशकिस्मत ही कहना होगा।
सचमुच नैना खुद को खुशकिस्मत मानती। उसके अनेकों कारण थे। पहला कि वह अपने पिता की अकेली संतान थी। तभी तो उसने इतने वर्षों वरुण द्वारा अपने परिवार को मनाने के समय का इंतजार कर पायी। ज्यादातर बेटियां इतना इंतजार नहीं कर पातीं। ऐसा नहीं है कि बेटियों का प्रेम सच्चा नहीं होता। वास्तव में उन्हीं का प्रेम सच्चा और विस्तृत सोच का होता है। प्रेमी की धारणा से बहुत आगे बढकर एक कन्या के मन में प्रेम की अवधारणा परिवार तक होती है। फिर एक कन्या खुद के प्रेम के लिये अपने भाई और बहनों की खुशियों की बलि नहीं चढा पाती। चुपचाप अपने प्रेम को बलिदान कर माता पिता की पसंद के युवक से शादी कर लेती है।
अपने प्रेम के लिये पूरे जीवन का इंतजार बेटियों के भाग्य में नहीं होता। इंतजार द्वारा प्रेम कहानियों का आदर्श बनते पुरुषों के मुकाबले नारियों की वह अधूरी कहानियाँ बहुत बड़े प्रेम का प्रतिनिधित्व करती हैं।
नैना द्वारा खुद को खुद किस्मत मानने का एक कारण वरुण का अपने प्रेम के लिये दृढ होना कहा जा सकता है। वरुण एक पुरुष होने के कारण ऐसी परिस्थितियों से बहुत अधिक समय तक संघर्ष करने में सक्षम था। नैना द्वारा भी उसे अपने माता पिता की बात मान लेने की इजाजत दे देने के बाद भी वह अपने निश्चय पर अटल रहा। उसके छोटे भाई, बहनों का भी विवाह हो चुका था। आखिर थक हार कर ही सही, वरुण के घर बालों ने उसकी पसंद को मंजूरी दे दी।
पर इन दोनों बातों के अतिरिक्त नैना की खुशकिस्मती की सबसे बड़ी बजह थी, उसके पिता राज सिंह। जिन्होंने नैना को अकेले पाल पोस कर बड़ा किया। उसे अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलायी। उसे अपने किये गये फैसलों पर दृढ होना सिखाया। उसे जिंदगी के ऐसे पाठ पढाये कि नैना कभी हार ही नहीं सकती थी। सच कहो तो नैना अपने जीवन की कामयाबी के हर कदम में खुद के साथ अपने पिता का साथ पाती थी। अब जब सामान्य से अधिक आयु में भी वह अपने प्रेमी वरुण के साथ जीवन का सफर तय करने जा रही थी, नैना देख रही थी – अपने पिता की आंखों से गिरते आंसुओं को। जिन्हें राज सिंह अक्सर बहुत चतुराई से पोंछ लेते थे। वास्तव में यही तो एक पिता का अपनी बेटी के लिये प्रेम है।
बचपन से ही नैना अपनी मम्मी के रूप में एक बड़ी सी तस्वीर देखती आयी थी। जिसपर फूलों का हार चढा रहता। पिता जी हमेशा उस तस्वीर को साफ करते। निश्चित ही नैना की मम्मी बहुत सुंदर रही थीं। नैना खुद को दर्पण में देखती तो खुद के भीतर अपनी माॅ का ही अश्क पाती।
नैना को अपनी माॅ की तो कोई स्मृति न थी। पर ऐसी अनेकों स्मृतियाँ थीं जबकि पिता की दूसरी शादी के लिये रिश्ते आये। अनेकों बार उसने अपने दादा और दादी को पिता पर शादी करने का दबाव बनाते देखा था। उससे भी आगे उसे ध्यान था कि एक बार तो उसके नाना नानी भी ननिहाल पक्ष की किसी लड़की से पापा की दूसरी शादी कराने की बात करने आये थे। वैसे किस लड़की से शादी कराने की बात थी, यह नैना को याद नहीं। नाना भी कई भाई थे। फिर जब लड़का अच्छा है तो अपने किसी भाई की बेटी के लिये अच्छा वर रहेगा। शायद यही उनकी धारणा रही होगी।
यह शायद राज सिंह का अपनी पत्नी के प्रति अपार प्रेम था कि उन्होंने अपने जीवन में किसी अन्य स्त्री को स्थान नहीं दिया। अपना जीवन नैना के लालन पालन में समर्पित कर दिया। पुरुषों के लिये यह बहुत कठिन काम है। एक स्त्री की याद में अपनी पूरी जिंदगी बिता देना, लगता नहीं कि किसी भी पुरुष के लिये संभव है। अनेकों बार प्रेम की गहरी कहानियों के पीछे भी कुछ शिथिलता होती है। कई बार प्रेम की डोर उसी समय मजबूत होती है जबकि वह डोर ही ध्वस्त हो चुकी होती है। बहुधा सब मिट जाने के बाद मनुष्य को अपनी भूल समझ आती है। फिर शेष बचता है केवल प्रायश्चित। प्रायश्चित करने से पाप मिटते हैं अथवा नहीं, इन आध्यात्मिक धारणाओं से परे कई बार प्रायश्चित किसी के जीवन का ही आधार बन जाता है। फिर उसे किसी के साथ की जरूरत नहीं होती। प्रायश्चित को अपना सहारा बनाकर पूरा जीवन अकेले बिता सकने में भी वह सक्षम होता है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
