बिरिंची और आसिन असम के गांव गोलाघाट में रहते थे।
उनका परिवार बहुत ही समृद्ध और धन-धान्य से परिपूर्ण था। एक दिन अचानक उस गांव में तूफान आने से दोनों बच्चे अपने माता-पिता से जुदा हो गए और किसी और गांव में पहुंच गए।
दोनों उस अनजान गांव के हाईवे पर भूखे प्यासे भटक रहे थे। तभी उन्हें एक ढाबा दिखा। बिरिंची ने अपनी बहन के लिए खाना मांगा। ढाबे का मालिक अच्छे दिल का था। उसने उन दोनों को खाना खिलाया और उन्हें अपने यहां आश्रय दिया। उसने उनसे कहा कि उन्हें बर्तन धोने होंगे और बदले में वह उन्हें सुबह शाम का खाना देगा। दोनों बच्चे मान गए।
वैसे तो ढाबे पर ज़्यादा लोग नहीं आते थे पर जो थोड़े बहुत बर्तन होते थे उसे बिरिंची ही धोता था। वह अपनी छोटी बहन को काम नहीं करने देता था।
एक दिन आसिन ने अपने भाई से कहा,” ढाबे का मालिक कितना ख़ाना कूड़े में डालता है। ऐसे तो उसे कितना पाप लगेगा।”
” हां, पाप तो लगेगा। पर हम क्या कर सकते हैं?” बिरिंची बोला।
आसिन ने कुछ सोचा और फिर बोली,” क्यों ना हम यह बचा हुआ खाना पक्षियों को डालें। मां भी तो डालती थी।”
यह कह उसकी आंखों में मां को याद कर आंसू आ गए।
बिरिंची उसे चुप कराते हुए बोला,” तू सही कह रही है। ऐसा करने से भूखे पक्षियों को भरपेट खाना मिलेगा।”
अब रोज़ वह दोनों बचे हुए खाने को पक्षियों को डालने लगे। देखते ही देखते वहां बहुत पक्षी आने लगे। इतने पक्षियों को देख दोनों ने सोचा कि क्यों ना इनके लिए यहीं घर बना दिए जाएं।
दोनों बच्चों ने खाली प्लास्टिक की बोतलें इकठ्ठी करी और उन को बीच में से काट कर उसमें मिट्टी भर कर ढाबे के पास खाली स्थान पर लगा दीं। मालिक के पूछने पर उन्होंने उसे सब बताया। तो वह खुश हो गया कि बच्चों ने उसे खाना फेंकने के पाप से बचा लिया।
देखते ही देखते वहां एक छोटा सा खूबसूरत पार्क बन गया। वहां बहुत से पक्षी रहने लगे। आम रूप से पाए जाने वाले पक्षी तो थे ही वहां पर कुछ दुर्लभ पक्षी भी वहां आने लगे।
बिरिंची और आसिन अपना ज्यादातर समय उन पक्षियों के साथ निकालते। दोनों उनके साथ हंसते खिलखिलाते रहते।पर अंदर ही अंदर दोनों को अपने माता-पिता से बिछड़ जाने का गम भी सताए जा रहा था।
कुछ ही समय में उस ढाबे की प्रख्याति बढ़ गई। उन दुर्लभ पाए जाने वाले पक्षियों को देखने दूर-दूर से लोग आते थे। वह वहां बैठ खाना खाते और पक्षियों की चहचहाहट और पार्क की खूबसूरती का लुत्फ़ उठाते। वह ढाबा ‘बिरिंची और आसिन का ढाबा’ के नाम से चर्चित हो गया।
उस ढ़ाबे की प्रसिद्धि इतनी बढ़ गई कि आसपास के गांवों तक भी पहुंच गयी। जब यह खबर बिरिंची और आसिन के माता-पिता तक पहुंची तो वह खुशी से झूम उठे और अपने बच्चों को लेने वहां पहुंच गए।
दोनों बच्चे उनको देख खुशी से झूम उठे। उनके मां-बाप ने ढ़ाबे के मालिक को दिल से धन्यवाद किया। ढ़ाबे के मालिक ने उन्हें भारी मन से विदा किया और उनसे वादा किया कि वह हमेशा उनके पक्षियों और बगीचे का ध्यान रखेगा और वह ढ़ाबा हमेशा उन दोनों के नाम से जाना जाएगा।
बिरिंची और आसिन ने एक बेकार पड़ी ज़मीन का कितनी खूबसूरती से सदुपयोग किया। यदि इसी तरह हम सब भी अपने आसपास हरियाली रखने का प्रयत्न करें तो प्रकृति का सरंक्षण तो होगा ही, साथ ही वन्य जीव और पशु-पक्षियों का सरंक्षण भी संभव हो पाएगा।
हमारे स्वार्थ के कारण हमने अपनी धरती को बंजर बना दिया है। अपने स्वार्थ को त्याग हमें दोबारा अपनी धरती को पुनः पुनर्जीवित करना पड़ेगा। अन्यथा ये धरती हमारे रहने लायक नहीं रहेगी। और मानव जाति का अंत हो जाएगा।
समाप्त
लेखिका
आस्था सिंघल
