पूस की रात में हो गई झमाझम बारिश ,कई दिनों से कोहरे और धुंध का प्रकोप किए था प्रताड़ित तभी मिला बारिश का वरदान। 
कुहासों में भीगी रात को विदा करता सूर्योदय लगता है कर रहा आगाज “खिलखिलाती सुबह” का। दिनकर की सर्द से गर्म होती रश्मियों का जाल ले रहा था आगोश में हर कंपकंपाती रूह को। नम पंखो वाले परिंदे भी निकल पड़े हैं नीड़ के झुरमुटों से स्वागत करने को नूतन सद्यः प्रस्फुटित खिलखिलाती सुबह का। माघ की बारिश में किटकिटाते जीव-जंतुओं के दंतुरित मुस्कान भी राहत पाने को हैं आतुर लेने को गर्माहट सर्द-गर्म रश्मियों से।मंथर गति से चली आ रही पूर्व दिशि की रक्तिमा स्वर्णाभ ऊष्मा से संवरती हुई खिलखिलाती सुबह का खुला आँचल पसारती चली आ रही मधुमय सिक्त नवोढ़ा नायिका सी मनोरम प्रकृति जो लुटाने को है उद्यत अपना अद्वितीय सौंदर्य। ऐसे में नयनोन्मीलित होते ही गृहस्वामिनी का भाप निकलती चाय के साथ आगमन किसी मनोवांछित उपहार से भी सैकड़ों गुना बढ़कर ही था कलमकार सुषुप्त कल्पनाओं को मिल गये थे सुरम्य पंख ——- 
आप समझ ही सकते हैं कि यदि
सुबह उठते ही एक प्याला बढ़िया चाय मिल जाए तो एक नया जोश, नई उमंग का आविर्भाव हो जाना स्वाभाविक ही है।लेखनी और कलमकार दोनों को,चाय पीने से हो उठते हैं तरो-ताजा तो साथ ही आलस्य भाग जाता है। नई चुस्ती-फुर्ती आ जाती है।
     वैसे चाय न सिर्फ सुबह की जरूरत है, वरन्‌ दिनभर में कभी भी पीने से यह  ताजगी से भर देती है। चाय न केवल एक पेय है, अपितु यह हमारे देश की संस्कृति का एक अंग बन गई है। घर आए मेहमान का स्वागत चाय पिलाकर करना हमारी सभ्यता में शामिल हो गया है।
    भारत ही नहीं, बल्कि कई देशों में चाय पिलाने का रिवाज है। जापान उनमें से एक है, चाय पिलाना उसकी मेहमाननवाजी में  विशेषतः  शामिल है। वैसे दुनियाभर में भारतीय चाय का कोई मुकाबला नहीं है। भारत में चाय के बागान दुनियाभर में सबसे ज्यादा हैं। आसाम, नीलगिरि पर्वत, दार्जिलिंग आदि चाय के बगानों के लिए मशहूर हैं।
    भारत में सैकड़ों किस्मों की चाय पैदा होती है। भारत में दुनिया की सबसे ज्यादा चाय का उत्पादन होने के कारण इसका विदेशों में निर्यात किया जाता है। अतः दुनियाभर में आज भारतीय चाय के चाहने वालों की वृद्धि हो रही है। चाय बनाने के कई तरीके हैं और हर प्रांत में चाय को बनाने की विधि अलग है।
   कश्मीर का कहवा हो या बिना दूध की नीबू वाली आइस्ड टी हो या फिर अदरक डालकर बनाई गई चाय हो। जो भी एक बार पीता है, बार-बार पीने का इच्छुक हो जाता है। वैसे चाय पीने से लाभ और हानि दोनों हैं। समझदारी इसी में है कि स्वाद तथा स्वास्थ्य में सामंजस्य बिठाकर चला जाय तो हर समस्या से बड़ी सरलता से दो-दो हाँथ किए जा सकते हैं, कहते हैं न कि ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’।
              (मौलिक विचार)
               लेखिका –
                 सुषमा श्रीवास्तव
    ऊधम सिंह नगर,  उत्तराखंड, 263153
                   
      
 
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