इक वक्त था “प्यारी माँ”
जब तू मुझे दुलारती थी।
हाथों से अपने मुझे
रोज़ संवारती थी।
मेरे ही सपने अपनी
आँखों में संजोती थी।
बेचैन रातों में मेरे
साथ जागती थी।
धड़कन जैसे मेरी तुझ
में ही बस जाती थी।
हर उलझन मेरी परेशान 
तुझे कर जाती थी।
फिर वक्त की बदली करवट
में मैं तुझसे दूर हो गयीं।
बंध कर समाज के बंधनों
में कितनी मज़बूर हो गयीं।
अनचाहे सायों की परछाईयों
के बीच कहीं गुम हो गयीं।
सिल दिया होठों को
कितनी खामोश हो गयीं।
नयी आहटों की गूंज
सुनने में मैं खो गयीं।
वेदना अंतर की तेरी
मेरे मन में भी उतर गयीं।
तुझ सी मूरत में ढली
मैं हर मुश्किल से लड़ गयीं।
जीवन के उतार चढ़ावों को
हंस कर झेल गयीं।
पर आज भी एक उदासी
तेरे बिन मन में रह गयीं।
दूर होकर तुझसे ये
टीस जाने कैसे सह गयीं।
सँभालते इन रिश्तों
को जब थकान को
हावी पाती हूँ।
सब कुछ करके भी
जब कुछ भी नहीं पाती हूँ।
एक पल भी सुकूँ जब
हासिल नहीं कर पाती हूँ।
तब बचपन में अपने
एक बाऱ लौट जाना चाहती हूँ।
उस वक्त को मैं दुबारा 
जी लेना चाहती हूँ।
गोद में तेरे सिर रखकर
माँ में फिर सो जाना चाहती हूँ।
💖Happy mother’s day 💖
स्वरचित 
शैली भागवत “आस”✍️💖
Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *