आज रोहन को सपनों में फिर वही स्वप्न दिखाई दिये। एक युवक और युवती के प्रेम भरे कई क्षण। दोनों पति पत्नी जैसे लग रहे थे। स्वप्न के कई क्षण वही थे जो रंजना की पेंटिग में चित्रित थे।
    एक नदी के किनारे दोनों बैठे एक दूसरे की आंखों में देख रहे थे।
    ” इस तरह क्यों देख रहे हों।”
    ” कुछ भी तो नहीं।” युवती के पूछने पर युवक बोला।
   फिर कुछ देर दोनों शांत रहे।
    ” वैसे वीनो। मैं तुझे ज्यादा खुश नहीं रख पाया। माॅ सही बोलती थीं। दिल भी अपनी औकात देखकर लगाना चाहिये। कहाॅ तुम जमींदार साहब की बेटी और कहाॅ मैं मजदूर। “
  ” अरे। आप तो फिर शुरू हो गये। मैं आपके साथ बहुत खुश हूं। हाॅ दिक्कत आपको हो सकती है। मुझे काम करना नहीं आता न। पर मैं सारे काम सीख लूंगीं। “
   फिर शांति छा गयी।
   एक दृश्य में युवती भैंस को चारा खिला रही है।युवक भागकर आता है। युवती के हाथ से चारा लेकर खुद भैंस के सामने डालने लगता है। 
  ” आपकी यही बात तो मुझे गलत लगती है। मुझे करने तो दो। “
  ” अरे तू तो मेरी रानी है। रानी तो बस आदेश देती है। काम करने को गुलाम हाजिर।” 
  खुद को रानी सुनकर युवती खुशी से फूल गयी। 
   ” अरे अब नहीं। अब मैं आपकी घरबाली हूं। हम दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं। लाओ मुझे काम करने दो। नहीं अम्मा बोलेंगी कि बहू को काम करने का मन ही नहीं होता। “
   ऐसे बहुत से प्रेम भरे दृश्यों के बाद फिर युवक और युवती दोनों घायल अवस्था में पङे हैं। युवक युवती की तरफ हाथ बढाता है। युवती धीरे से उसका हाथ पकङ लेती है। दोनों को कुछ लोग घेरकर खङे हैं जिनका चेहरा नहीं दिख रहा। फिर स्वप्न में भी अंधेरा छा गया। 
   हमेशा की तरह रोहन पसीने से तर बतर हो गया। यही अंतिम दृश्य उसे वैचेन कर देता। आज भी उसकी नींद खुल गयी। महेश सो रहा था। रोहन ने उसे देखा और पानी की बोतल उठाकर मुंह में लगा ली। फिर सोने की चेष्टा करने लगा। 
  ये स्वप्न रोहन को न जाने कितनी बार आये होंगें। आज उसे लगा कि शायद प्रदर्शनी में मिली लङकी उसके सपनों के विषय में कुछ जानती है। पर उसने तो उस लङकी का नाम भी नहीं पूछा। वह किस कक्षा की छात्रा है यह भी उसे नहीं मालूम। हाॅ गाना गाने बाली पल्लवी जरूर बीए सेकंड ईयर की स्टूडेंट थी। वह उसे रंजना से मिला सकती है। पर इस तरह पल्लवी से मिलना ठीक होगा। वह क्या समझेगी। कुछ गलत भी समझ सकती है। पर मिलना तो होगा ही। 
   आज रंजना भी बहुत बैचेन थी। उसकी पेंटिंग में जो युवक है, उससे मिलती शक्ल का लङका उसने आज देखा है। तो उस लङके को ढूंढना जरूरी है। शायद उसे पल्लवी लेकर आयी थी। तो क्या वह पल्लवी की जान पहचान का है। कुछ भी हो, पल्लवी मुझे उससे मिला सकती है। 
   इन्हीं विचारों में रात में न तो ठीक से रोहन सो पाया और न रंजना। सुबह की शुरुआत के साथ ही दोनों को गहरी नींद आ गयी। अक्सर रात भर करवट बदलने बाले सुबह देर तक सोते रहते हैं। दोनों तब उठे जब उन्हें उठाया गया। 
  ” रंजना। अब सोती रहोंगीं। देखो कितना दिन निकल आया है।” 
   माॅ के बोलने पर रंजना उठी। अरे वास्तव में आज जगने में देर हो गयी। 
   दूसरी तरफ इंजीनियरिंग कालेज के छात्रावास में.. 
  ” अरे भाई। किसके सपने देख रहे हों कि उठने का मन ही नहीं कर रहा। चलो सच सच बताओ ।गाने बाली सपनों में आ रही है या पेंटिग बाली। 
  ” तू भी महेश। कुछ भी बोलने लगता है। “
   रोहन उठकर तैयार होने चला गया। आज जगने में ज्यादा देर हो गयी। अगर देर हो गयी तो मैस में नाश्ता नहीं मिलेगा। फिर खाली पेट क्लास के लिये जाना होगा। 
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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