रामचंद्र जी के पुरखे चालीस गांवों के जमींदार थे। अब आजाद भारत में जमींदारी तो रही नहीं पर संपत्ति में कोई कमी नहीं है। पर अधिक संपत्ति से ही मनुष्य सुखी होता है, यह भ्रम ही है। रामचंद्र जी का जीवन इसका उदाहरण है।
बचपन से ही माॅ का साया उनके सर से उठ गया। रामचंद्र के पिता राधा मोहन पत्नी के निधन के बाद कुछ दिन रोये। पर एक कहावत है कि मर्द को कभी रोना नहीं चाहिये। उन्हें दूसरी शादी के लिये मनाने बालों की कमी नहीं थी। वैसे उन सभी के अपने स्वार्थ थे। वास्तविक उद्देश्य जमींदार साहब की अकूत संपत्ति था। पर हमेशा कारण रामचंद्र का पालन पोषण समझाया गया।
” अब तुम लङके को कैसे सम्हालोंगें। बच्चे के लिये माॅ का साथ बहुत जरूरी है। हमारी जानकारी में अच्छी लङकी है। एक बार उसे मिल लो। तुम्हारी सारी चिंताएं खत्म हो जायेंगी।”
. सारे रिश्तेदारों की तरफ से यही प्रस्ताव आते। राधा मोहन जी रिश्तेदारों का अदब करते थे। आखिर उनके मन में भी यही बात जच गयी। फिर रामचंद्र की दूसरी माॅ हवेली में आ गयी।
बात सही निकली कि राधा मोहन जी की सारी चिंताएं समाप्त हो गयीं। चिंताएं तो वास्तव में मन का विकार होती हैं। यदि मन प्रसन्न तो फिर वास्तव में चिंता की बजह होने पर भी मनुष्य उन्हें अनदेखा करने लगता है। नयी पत्नी ने जमींदार साहब पर रूप मोहनी का ऐसा जाल डाला कि उनकी सोचने समझने की शक्ति ही समाप्त हो गयी। माॅ के वियोग में तङपता रामचंद्र दूसरी माॅ के आने के बाद भी पहली तरह ही दुखी रहा। पिता का प्रेम अपनी दूसरी पत्नी व उससे हुए पुत्र लक्ष्मणदास पर केंद्रित हो गया।
भाइयों में राम और लक्ष्मण का प्रेम हमेशा याद किया जाता है। पर वह तो त्रेता युग की बात थी। रामचंद्र के छोटे भाई लक्ष्मणदास हमेशा से विशिष्ट व्यवहार का आदी रहा। उसके मन में बङे भाई के प्रति कोई आदर नहीं था।
बचपन निकलने के बाद कुछ समय के लिये रामचंद्र के जीवन में खुशियां आयीं। उनका विवाह लक्ष्मी नामक कन्या से हो गया जो रूप और गुण सभी में बहुत आगे थी। पर एक बार फिर से रामचंद्र के जीवन में आयीं खुशियां रूठ गयीं। एक बच्ची को जन्म देकर लक्ष्मी परलोक चल दी। रामचंद्र अकेले रह गये।
ं. रामचंद्र अब अपनी संपत्ति के मालिक थे। उनके पुनर्विवाह के लिये अनेकों प्रस्ताव आये। पर उन्होंने किसी की बात न मानी। जो दुख उन्होंने खुद झेला था, उसे अपनी बेटी को देना नहीं चाहते थे। अब उनकी पुत्री ही उनकी जिंदगी बन गयी।
वीना अपने पिता का बहुत सम्मान करती थी। पिता ने उसे सारी खुशियां दीं थीं। वीना पढने शहर भी गयी। उन दिनों के हिसाब से यह बङी बात है।
एक पिता की इच्छा हमेशा अपनी बेटी को खुशियां देने की होती है। पर खुशियों की कोई यथार्थ परिभाषा नहीं है। कुछ लोग धन संपत्ति में सुख महसूस करते हैं। पर कुछ लोग सुख के लिये धन को ठोकर मार देते हैं। कुछ की नजर में यह प्रेम था तो कुछ की नजर में रामू ने वीना को अपने जाल में फसाया था। रामचंद्र जी के अरमानों पर पानी फेरकर वीना एक निर्धन लङके रामू के साथ चली गयी। अब रामू और वीना का कोई मेल तो नहीं था। वीना पढी लिखी लङकी और रामू ठेठ गंवार। बस रामू बांसुरी अच्छी बजाता था। गाना अच्छा गा लेता था। भोली भाली लङकी बहक गयी। पर सबसे ज्यादा दुखद बात यह हुई कि रामू और वीना गायब हो गये।
रामचंद्र भले ही वीना से नाराज थे। पर वह समझ गये कि कारिस्तानी उस नीच रामू की है। जब उसे महसूस हो गया कि बाप की संपत्ति हाथ नहीं लगने बाली है तो लङकी के साथ कुछ कर दिया। वैसे यह केवल संदेह था पर पूरा पुलिस विभाग रामचंद्र जी के संदेह को सत्य बनाने में लग गया। रामू की माॅ को पुलिस पकङ लायी। फिर जब उससे अच्छी तरह सख्ती की तो पता चला कि जमीदार जी का संदेह सही था। रामू की माॅ को बहू की हत्या करने के अपराध में आजीवन कारावास की सजा हुई। पर वह धूर्त रामू कभी भी पुलिस के हत्थे नहीं चढा। इन अठारह सालों में रामचंद्र उस धूर्त कातिल को तलाश रहे हैं। उसकी फोटो आज भी थाने के मोस्ट वांटेड अपराधियों की लिस्ट में लगी है।
रामचंद्र जी ही गैस्ट हाउस के मालिक हैं। वैसे वह तो गांव में रहते हैं पर जब मन होता है तो विहारी जी से अर्जी करने वृन्दावन आ जाते हैं। अब संसार में उनकी रुचि नहीं है। फिर भी वह जी रहे हैं। अपनी बेटी के हत्यारे को सजा दिलवाने के लिये मौत से दो हाथ कर सकते हैं। पर क्या उनका मानना सही है। संभव हो कि रामू वीना से सच्चा प्रेम करता हो। संभव है कि रामू ने वीना की हत्या न की हो। पर इतने समय में उनके मन में यही धारणा इस कदर व्याप्त हो चुकी है कि वह इसके विपरीत सुनना भी नहीं पसंद करते।
कल शरद पूर्णिमा है। रामचंद्र जी ने मैनेजर राधेलाल को फोन कर दिया। वैसे रामचंद्र जी का कमरा हमेशा रिजर्व रहता है। पर रामचंद्र जी बता देते हैं तो राधेलाल साफ सफाई करा देता है। राधेलाल रामचंद्र जी का बहुत विश्वास पात्र है। पहले रामचंद्र जी के खेतों की देखभाल करता था। फिर रामचंद्र जी ने उसे गैस्ट हाउस के लिये भेज दिया।
राधेलाल ने रामचंद्र जी के कमरे में सफाई करा दी। तभी चारों बच्चे आ गये। वैसे रामचंद्र जी का कमरा रंजना और पल्लवी को देना बहुत साहस का काम है। पर राधेलाल ने न केवल यह साहस किया अपितु वह रामचंद्र जी के आगमन की प्रतीक्षा भी करने लगा। रामचंद्र जी के रुकने के लिये उसने अपने कमरे में व्यवस्था कर दी। और खुद का विस्तर जमीन पर लगा लिया।
क्रमशः अगले भाग में…..
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
