सदियों से जब भी भाई भाई का प्रेम याद किया जाता तो हमेशा राम और लक्ष्मण का नाम सामने आता है। वैसे दोनों की माता अलग अलग थीं। जहाॅ श्री राम कौशल्या माता के पुत्र थे, वहीं लक्ष्मण जी की माता सुमित्रा थीं। फिर भी उनके मध्य सौतेला जैसा कुछ भी नहीं था। लगता है कि सौतेले भाई की अवधारणा बहुत बाद में बनी। समय के अनुसार सौतेले भाइयों में प्रेम कम होता गया। पर प्रेम न होना अलग बात है। सौतेले भाई का इतनी दुष्टता पर उतरना दूसरी बात है। आसानी से विश्वास भी नहीं होता कि यदि रामचंद्र के पास धन संपत्ति की कोई कमी नहीं है तो लक्ष्मणदास भी कहाॅ कम थे। राजनैतिक प्रभुत्व में भी वह रामचंद्र से कम नहीं थे। पर आज भी सच्चाई की जीत होती है। कितना भी पहुंचा हुआ व्यक्ति हो, आखिर राजनैतिक दल उससे किनारा कर लेते हैं। यह बात लक्ष्मणदास भी जानता था। तो जब तक पुलिस उसे गिरफ्तार करती, वह अपनी पत्नी सुनीता, बेटा सोम्य और बहू शुचिता के साथ घर छोड़कर भाग गया।
   पुलिस अपराधियों की तलाश में जगह जगह दबिश दे रही थी। आखिर सबसे पहले शुचिता पुलिस की गिरफ्त में आयी। जब जहाज डूबता है तो सबसे पहले चूहे ही भागते हैं। अभी तक उसके पैसों पर कितने रिश्तेदारों ने मौज मारी थीं। पर इनाम के लालच में उसकी सूचना खुद उसके भाई ने दी। सही कहा है कि कुछ लोग केवल मतलब से रिश्ते बनाते हैं।
   शुरुआत में शुचिता ने अनजान और निर्दोष बनने का नाटक किया। न तो उसे इस बारे में कुछ पता है कि बच्चों पर किसने हमला कराया है और न रामू और वीना के बारे में उसे कुछ भी मालूम है। फिर रामचंद्र और ममता वैसे भी सीधे थे। धूर्त लोग सीधे लोगों को अक़्सर मूर्ख बना लेते हैं। पर पुलिस आसानी से किसी की बात पर यकीन नहीं करती। तो रामचंद्र और ममता के हटते ही महिला पुलिस ने शुचिता से अपनी तरह से सही जानकारी निकाल ली। जिसमें रामू और वीना की लाश के अलावा परिवार के दूसरे सदस्यों की छिपे होने की जगह भी थी। सभी पकङे गये । बच्चों पर हमला करने बाले बदमाश भी पकङे गये। 
   शुचिता की निशानदेही पर उन्हीं के खेतों में दबे रामू और वीना के कंकाल निकाल लिये। जिन्हें डी एन ए टेस्ट के लिये प्रयोगशाला में भेज दिया गया। निश्चित ही उनका डी एन ए रामचंद्र और ममता से मिलेगा। लालच में मनुष्य इतना गिर जाता है कि अपने रक्त संबंधों को भी भूल जाता है। 
क्रमशः अगले भाग में….
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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