अनजानी सी डगर में
तुमसे मुलाक़ात हुई,
अगल थे हम एक दुजे से,
फिर भी आँखो ही आँखो में बात हुई।।
तू पूरब तो मैं पश्चिम थी,
विचारों का कोई आपस मे मेल न था,
फिर भी जाने क्यो तू मेरी निगाहों बसता गया।।
टकराव हर कदम पर था,
मतभेद हर बात में थी,
दुश्मन तू मुझे लगता था,
मित्रता की कोई आस न थी।।
 फिर भी न जाने कैसा बन्धन ,
तुझसे यू जुड़ गया,
जिनके आपस मिलने की कोई उम्मीद न थी
उनसे रिश्ता सा बन गया।
माना अलग है हम दोनों 
फिर भी एक दुजे की परछाई है,
कभी मैं कोशिश करती हूँ 
तुझे समझने की और कभी तू 
बिन कहे मेरी हर बात समंझ जाता है।।
सुमेधा शर्व शुक्ला 
   हरियाणा
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