पिता हैं साथ में जब तक, इरादा ठोस होता है
पिता की जिंदगी के बाद सिर्फ अफसोस होता है
यदि माता को ही बेटे की बीमारी सताती है
कभी सोचो पिता को क्या तभी भी नींद आती है
पिता के अंस पर बैठे, जहां को हमने देखा है
उसी का प्रेम ही केवल , निर्देशन की रेखा है
पिता के साथ विद्यालय व मेला खूब घूमें है
कभी क्या प्रेम में आकर पिता के चरण चूमें हैं
जगत ने जब दिया धोख़ा पिता नें तब उठाया है
कभी भूखे हुए तो हाथ से भोजन खिलाया है
पिता के साथ होने का मूल्य भी जानता है वह
साया जिस के सर ना हो पिता को माँगता है वह
पिता हैं साथ में जब तक ,कोई डर हो नहीं सकता
पिता के बाद जीवन में कोई सुर हो नहीं सकता
अपनी पंक्ति माध्यम से ये “उज्ज्वल” प्रण कराता है
जगत की पितृ शक्ति को भी शत शत शीश नवाता है
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