नाहक समझकर अपनों ने, नाचीज बना दिया मुझको।
सौतन से लगाकर दिल सबने, बेघर बना दिया मुझको।।
नाहक समझकर अपनों ने———।।
क्यों दोष फिरंगियों को मैं दूँ ,अपनों ने किया है सितम।
किससे मैं अपनी पीड़ा कहूँ, बेजुबां बना दिया मुझको।।
नाहक समझकर अपनों ने——–।।
कभी होती थी पूजा मेरी, मैं जान थी यहाँ हर दिल की।
नहीं माना गया मुझको सबला,अबला बना दिया मुझको।।
नाहक समझकर अपनों ने———।।
कभी आन थी हिंदुस्तान की, पहचान थी हिंदुस्तान की।
अब कौन करें रक्षा मेरी, बेख्वाब बना दिया मुझको।।
नाहक समझकर अपनों ने——–।।
रह गई अब मैं मात्रभाषा, इंग्लिश की आई बहार जो।
मैं ताज बनूँ कैसे सिर का, बेताज बना दिया मुझको।।
नाहक समझकर अपनों ने———।।
रचनाकार एवं लेखक-
गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद
तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)
