रात के सन्नाटे में
ना धर्म होता है मेरा कोई
पूछे ना जाति कोई
नाम काम से ना कोई वास्ता
चीखे होती है मासूम सी
निरपराध सी आंखें मेरी
तार-तार होती है देह मेरी
उस दिन सच में रात काली
चांद तारों की बिखरती कहानी
सुबह होती है सबकी पर मेरी नहीं
सुर्खियां बटोरती है काली रात मेरी
वो मोमबत्तियां जख्मों पर गिरती है मेरे
घावों को नासूर बना देती है
कभी सोचा है आपने वो पिघलता मोम
मेरी देह को अंदर तक कचोटता है
ना जलाएं इनको विनती है मेरी
राजनीति की आंच पे धर्म की रोटियां भी ना सेंके
वो काली रात बिना धर्म और जाति की होती है
फिर पापियों का धर्म और जाति कैसी
दोष धर्म और जाति का नहीं मानसिकता का है
या तो उसे बदलो या उखाड़ फेंको उसे जड़ से
आभारी रहूंगी सबकी मैं
पर चर्चा का विषय ना बनाओ मेरी देह को
जख्मी हूं मैं रूह तक
नमक ना लगाओ मुझे |
प्रिया शर्मा “पंखुड़ी”
