देखो यह गुलाब भी अब मुरझाने लगा,
शायद तुम्हारी यादों को अब भुलाने लगा,
महक आती थी जो तुम्हारे प्रेम की इसमें,
उस मोहकता को त्याग अब सताने लगा।
रूप रंग बिगड़ रहा, सूरत से जाने लगा,
काली पड़ रही पंखुड़ी, खुद को जलाने लगा,
हाल इसका ना देखा जाता, बेहाल होने पर,
रह रह तेरे प्रेम को, यह आज़माने लगा।
देखो यह गुलाब भी अब मुरझाने लगा।
