शिवानी से धोखा पाकर और अचित्या से अपना लक्ष्य पाकर जब प्रवेश अपनी माॅ संध्या के पास आया तब सबसे पूर्व उसने उस भूल के लिये क्षमा मांगी जो उसने प्रेम के प्रवाह में की थी। हालांकि किसी माॅ के लिये अपने पुत्र की असफलता का कारण कब अज्ञात होता है। विज्ञान के विषय में इतना होशियार प्रवेश जब एन डी ए की लिखित परीक्षा भी उत्तीर्ण नहीं कर पाया था, संध्या उसी समय सब समझ चुकी थी। फिर बेटे की खुशी के लिये चुप बनी रही। हालांकि अनेकों बार उसके मन में प्रवेश का आचरण पीड़ा पहुंचाता रहा। पर अपने बेटे की रुचि देख वह उस पीड़ा को चुपचाप सहन करती रही। आज उसका पुत्र प्रवेश एक बार फिर से उसके सपनों को पूरा करना चाहता है। गहराई से उसे अचित्या की भूमिका समझ आयी। एक माॅ न केवल बेटे की पसंद पहचान जाती है अपितु बेटे को पसंद करने बालों को भी जान जाती है। समझ गयी कि प्रेम में धोखा खाने के बाद भी उसका पुत्र प्रवेश अंधकार भरी गलियों में नहीं भटकेगा। उसका सच्चा प्रेम उसके पथ को प्रकाशित करता रहेगा। उसे दिशा देता रहेगा।
अंतिम साक्षात्कार में सफलता पाने के लिये प्रवेश ने बहुत मेहनत की। बीच बीच में अचिंत्या का फोन भी आता रहा। वह भी प्रवेश को प्रोत्साहित करती रही। मेहनत, प्रोत्साहन और आत्मबल के संगम से प्रवेश ने अपनी माता संध्या का सपना पूरा किया।
अचिंत्या ने इंजीनियरिंग में पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा किया। वह एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कालेज में अध्यापन का कार्य करने लगी। अनेकों वर्षों तक दोनों ही एक दूसरे से फोन से संपर्क में रहे। पर अचिंत्या ने कभी भी अपने मुख से प्रेम का इजहार नहीं किया। हालांकि उसका इंतजार जारी रहा। वह उस दिन का इंतजार करती रही जबकि प्रवेश उसके प्रेम को खुद व खुद समझ पाये और उसे अपने जीवन में स्थान दे।
शिवानी के जीवन में आये व्यवधान के विषय में प्रवेश को अचिंत्या ने ही बताया था। बहुत संभावना थी कि प्रवेश का शिवानी के प्रति पुराना प्रेम उफान लेकर अपनी राह ले ले। निश्चित ही प्रवेश के प्रेम ने उफान भरा। पर वह किसी भी तरह माॅ के प्रति बोले अपशव्दो को भुला नहीं पाया। आज वह जान चुका था कि उसका पहला प्रेम उसकी माॅ है। संसार में कोई भी ऐसा प्रेम नहीं है जो कि उसके माॅ के प्रेम की बराबरी कर सके। प्रवेश के शिवानी के प्रति प्रेम ने शिवानी के जीवन को ही सही दशा दी। पर अभी तक खुद प्रवेश अकेला था। दूसरी तरफ अचिंत्या भी अकेली थी। पर प्रवेश समझ नहीं पा रहा था कि वास्तव में अचिंत्या उसका इंतजार कर रही है।
मनोज और ज्योति के बेटे प्रद्युम्न ने मेहनत का मार्ग चुना। कुछ उसकी लगन और कुछ संध्या का सहयोग, वह खुद के गैराज का मालिक बन गया। जिसपर लोग विश्वास करते थे। संध्या से संबंध के कारण उसका विवाह भी एक निर्धन परिवार की पर गुणी कन्या से हो गया। प्रद्युम्न भी पत्नी भी उसके साथ उसके काम में सहयोग देने लगी। संध्या से मिले संस्कारों के कारण प्रद्युम्न के परिवार में आदमी औरत के भेदभाव जैसी कोई बात नहीं रही।
सेना के बाद पुलिस विभाग में भी अपनी सेवाएं देकर संध्या सेवानिवृत्त हो गयी। इस समय जानकी देवी की आयु बहुत अधिक हो चुकी थी। अब उनकी अंतिम इच्छा नाती प्रवेश का विवाह देखने की थी।
वैसे प्रवेश के लिये अनेकों कन्याओं के रिश्ते आये। न तो उन कन्याओं में कोई कमी थी और न ही उनके परिवार में। पर संध्या जानती थी कि प्रवेश की जीवन संगिनी इनमें से कोई भी कन्या नहीं है। उसकी जीवन संगिनी तो अभी भी उसका इंतजार कर रही है।
धीरे धीरे संध्या प्रवेश को स्मरण कराने लगी कि अब उसका भी विवाह करना है। उसकी दादी की इच्छा भी यही है। अनेकों लड़की बाले आ रहे हैं। पर पता नहीं क्यों? उनमें से कोई पसंद नहीं आयी।
प्रवेश यही समझता कि शिवानी के प्रेम की असफलता के बाद भी माॅ उसके वैवाहिक जीवन को दिशा देना चाहती हैं। इस समय हर लड़की बाला उससे अपनी लड़की का विवाह कराने को तैयार भी है। पर प्रवेश पूरी बात का अर्थ समझ न पाता। माॅ उसका विवाह करना चाहती हैं पर उन्हें कोई भी लड़की पसंद नहीं आ रही। भला क्यों?
” क्यों कोई लड़की पसंद नहीं आ रही। एक तरफ तो बार बार मुझसे शादी के लिये कहती हों और दूसरी तरफ आपको ही कोई लड़की पसंद नहीं आ रही। जो आपको अच्छी लगे, उससे बात फाइनल कर दो। समझ तो कि मैं पुरानी बात भूल चुका हूं। माॅ के कहने पर जीवन में एक बार फिर वही राह चुनूंगा जो कि माॅ चाहती है। “
जब संध्या हर रोज एक जैसी बात दुहराती तो एक दिन प्रवेश के मुख से ऐसा ही निकल गया। संध्या मानों इसी पल का इंतजार कर रही थी।
” कमी तो किसी भी लड़की में नहीं है। पर लगता है कि कोई तुझसे प्रेम करने बाली तेरी हाॅ का इंतजार कर रही है। कोई है जिसके प्रेम ने तुझे उस समय भी सहारा दिया जबकि तुम बिलकुल बेसहारा थे। लगता है कि कहीं तुम्हारा प्रेम तुम्हारा इंतजार कर रहा है। प्रेम केवल वही तो नहीं जो तुमने किया था। कहीं ऐसा प्रेम भी है जो तुम्हें प्रेम करता है। “
फिर प्रवेश पूरी रात सो न सका। माॅ की हर बात गहराई से सोचता रहा।
सुबह का समय। अचिंत्या कालेज जाने की तैयारी कर रही थी कि प्रवेश का फोन आ गया। इतना सुबह तो वह कभी फोन नहीं करता था। प्रेम बहुधा व्यग्र कर देता है ।
घबराहट में अचिंत्या के पसीने छूटने लगे।डरते डरते फोन उठाया। दूसरी तरफ से प्रवेश ने प्रश्न किया।
” अचिंत्या। एक बार तुमने बताया था कि मेरी माँ ही मेरा पहला प्रेम हैं। संसार का कोई भी प्रेम उसके प्रेम की बराबरी नहीं कर सकता।”
” हाॅ। बिलकुल। सही तो कहा था मैंने।”
” अचिंत्या ।मेरी माँ कह रही है कि मेरा प्रेम मेरी हाॅ का इंतजार कर रहा है। कोई है जिसका प्रेम मुझे राह दिखा रहा है। वह कौन है। क्या तुम जानती हो। “
अचिंत्या चुप रही।
” अचिंत्या। मुझे तो बस तुम्हीं ने राह दिखाई है। फिर वह तुम्हीं तो नहीं। सच अचिंत्या ।क्या वह तुम ही हों। “
अचिंत्या एक बार फिर से चुप रही। पर आंखों से बहते आंसू सब बयान कर गये। हिचकियों को अचिंत्या ने बलपूर्वक रोक लिया। फोन पर अचिंत्या के आंसुओं को देख पाने की स्थिति में प्रवेश न था।
प्रेम अपनी मंजिल पाने के करीब था। पर कोई हलचल समझ में नहीं आयी। यह शांति उस सत्य का प्रतिनिधित्व करने लगी जो कि प्रवेश की माॅ संध्या ने कहा था।
बहुत देर दोनों शांत रहे। फिर प्रवेश ने ही बात को आगे बढाया।
” अचिंत्या । प्रेम में धोखा खाकर अभी तक मैंने शादी नहीं की। पर तुमने शादी क्यों नहीं की।”
इस बार अचिंत्या चुप न रह पायी।
” मैं तो इंतजार कर रही थी। है कोई। जो मेरे प्रेम को समझ नहीं पाया। है कोई जो कि हमेशा प्रेम के नजदीक रहकर भी उस प्रेम को पहचान नहीं पाया। “
” बट इट इस रोंग अचिंत्या। तुम अपने दोस्त को सब समझाती रहीं। अपने दोस्त को सही राह दिखाती रहीं। पर यह नहीं समझाया। आखिर क्यों? “
” वह इसलिये। क्योंकि कुछ बातों को समझाया नहीं जाता। उन्हें खुद समझना होता है। बस इंतजार किया जा सकता है कि कब वह समझे। इंतजार का कोई समय भी नहीं होता। दिन, सप्ताह, महीने, वर्ष और कभी कभी तो पूरी जिंदगी। वास्तव में यही इंतजार ही तो प्रेम है। अन्यथा अवसरवादिता ही तो है। “
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इसके बाद संध्या और अचिंत्या के माता पिता ने मिलकर दोनों की शादी तय कर दी। सही समय पर दोनों का विवाह कर दिया गया। प्रवेश के जीवन में उसके सच्चे प्रेम का प्रवेश हो गया। इस समय जो सबसे ज्यादा खुश है, बतायें वह कौन है?
अरे भाई। मूल से ज्यादा व्याज प्रिय होता है।पुत्र से अधिक पौत्र प्रिय होता है तो पुत्रवधू से ज्यादा पौत्रवधू प्रिय हुई ना। जिसका पौत्र विवाह कर दादी के लिये नयी दुल्हनिया लेकर आया है, वह जानकी देवी ही तो सबसे ज्यादा खुश होंगीं।
समाप्त
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
