प्रवेश जा रहा था, उस शहर की तरफ जहाँ के छात्रावास में रहकर उसने इंटरमीडिएट की पढाई की थी। माॅ संध्या का बार बार स्थानांतरण होने के कारण प्रवेश की पढाई आवासीय विद्यालय में होती रही थी। उसी शहर में उसका परिचय शिवानी और अचिंत्या से हुआ था।
कितने अच्छे दिन थे। जबकि रोज दो प्रेमियों का मिलन होता था। आवासीय विद्यालय के क्लास रूम से लेकर कैंटीन तक दो प्रेमियों के प्रेम के गवाह बनते थे। प्रवेश की सफलता पर शिवानी जमकर खुशियां मनाती थी।
प्रवेश जानता नहीं था कि उसी विद्यालय की क्लासरूम में एक गुप्त प्रेम कहानी भी आरंभ हुई थी। जिसकी गवाही देने के लिये भले ही कोई न हो। पर अंतर्मन में तलाशने पर निश्चित ही वह अमर प्रेम दिखाई देगा।
वैसे तो इस समय प्रवेश को अपनी माॅ और दादी के पास जाना चाहिये। पर वह शिवानी के पास जा रहा है। हालांकि इस बार वह अपनी माॅ को कोई धोखा नहीं दे रहा है। इस विषय में उसने अपनी माॅ को सब सच बता दिया है।
भले ही अचिंत्या ने कभी भी प्रवेश के सामने अपने प्रेम का इजहार नहीं किया। वह कभी भी अपनी सखी की प्रेम के मध्य नहीं आयी। पर वह प्रवेश की अपेक्षा अधिक अनुभवी है। वह जानती है कि अब शिवानी ने अपनी नयी राह पकड़ ली है। वैसे भी उसके शहर में क्या हो रहा है, इसकी जानकारी उसे आसानी से मिलती रहती है।
इस समय वह भी प्रवेश के साथ आ रही है। यद्यपि वह प्रवेश को सहारा देने के लिये साथ में है। पर ऐसा व्यक्त करने की क्या आवश्यकता है।
बस से उतरते ही प्रवेश सीधा शिवानी के घर चलने लगा। पर अचिंत्या ने उसे रोका। पहले वह प्रवेश को खुद के घर ले गयी। अचिंत्या के मम्मी पापा भी प्रवेश को पहले से जानते थे। वैसे अचिंत्या ने कभी भी अपने मन के भावों को अपने घर भी नहीं बताया था। पर सत्य यह भी है कि माता पिता हमेशा अपने बच्चों के मन को समझ लेते हैं।
थोड़ा आराम कर वह प्रवेश के साथ शिवानी के घर चल दी। अब वह समय आ चुका था जबकि प्रवेश का सामना सच से होगा। वह समय आ चुका था जबकि वह खुद को ठगा सा महसूस करेगा। वह समय आ चुका था जबकि उसे प्रेम के नाम पर मिलते रहे धोखे का पता चलेगा। शायद उसी समय उसे अचिंत्या के सहारे की जरूरत होगी।
प्रवेश अनेकों बार शिवानी के घर जा चुका था। शिवानी के माता पिता उसे अच्छी तरह जानते थे। पर इस बार शिवानी के घर बालों ने प्रवेश को देखकर अनदेखा कर दिया। निश्चित ही यदि अचिंत्या उसके साथ न होती तो शिवानी के घर बाले उसे घर में आने ही नहीं देते। बात का बतंगड़ बन जाता।
प्रवेश लगातार खुद की अवहेलना होते देख रहा था। न केवल घर बालों से, अपितु शिवानी ने भी उसे देखकर कोई वैसी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, जिसकी प्रवेश को उम्मीद थी। हालांकि वह प्रवेश को पुराने साथी के रूप में पहचान गयी। अपने माता पिता से भी उसने प्रवेश का वह परिचय दिया। प्रवेश पहले साथ पढा करते थे। अब अचिंत्या के साथ इंजीनियरिंग करके आये हैं। एक अजीब सा नाटक चल रहा था। प्रवेश समझ ही नहीं पा रहा था।
काश वह सब कोई नाटक होता। काश प्रवेश का मन निराशा के भंवर में न डूबता।
रही सही बात शिवानी और उसके घर बालों ने शिवानी के विवाह तय होने की बात सुनाकर पूरी कर दी। वैसे प्रवेश से सीधे सीधे कुछ नहीं कहा पर अनेकों तरीकों से व्यक्त कर दिया कि वह कहीं से उनकी बेटी के लायक नहीं है। अपमान रूपी विष के कड़बे घूंट में एक घूंट ऐसा आ गया जिसे चाहकर भी प्रवेश निगल नहीं सकता था।
” अब तुम्हें क्या बतायें अचिंत्या। आजकल तो जाति पांति ही नहीं रही। सब धर्म भृष्ट हो चुके हैं। लड़की के लिये कितने लड़के तलाशे। एक बार तो धोखा खाते खाते बचे। हम तो लड़के बालों को ठाकुर ही समझ रहे थे। पर पता चला कि लड़के की माॅ कोई छोटी जाति की है। अरे फिर लड़का ठाकुर कैसे रहा। इस तरह जाति भृष्टों को अपनी लड़की कैसे दे सकते हैं। नहीं। बिलकुल नहीं। फिर हमारे पास ऐसी क्या कमी है। ईश्वर ने हमारी शिवानी के भाग्य में ऐसा अनुकूल वर तैयार रखा है। रुपये पैसे में किसी ने कम नहीं। जाति पर कोई शक नहीं। “
प्रवेश उठ खड़ा हुआ। अब उसे कुछ भी जानना शेष न था। अब मजाक तो नहीं हो रहा है। उसका नहीं अपितु उसकी माॅ का अपमान हो रहा है। नहीं। अब शिवानी क्षमा भी मांगेगी तो उसका मेरे जीवन में कोई स्थान नहीं।
निश्चित ही इस समय प्रवेश को एक साथी की जरूरत थी। एक ऐसा साथी जिससे वह अपने मन की बात कह सके। एक ऐसा साथी जो उसको राह दिखा सके। अचिंत्या ही वह साथी बनेगी। अचिंत्या प्रवेश का साथ आयी ही इसी लिये थी। अन्यथा शिवानी द्वारा किये धोखे को वह पहले से जानती थी। वह प्रवेश को पहले भी सच बता सकती थी। पर जानती थी कि शिवानी से सच्चा प्रेम करने बाला प्रवेश टूट जायेगा। फिर पढाई के आखरी क्षण में भटक जायेगा। लक्ष्य तक पहुंचते पहुंचते लक्ष्यहीन हो जायेगा।
जो खुद से बढकर प्रेमी की चिंता करे, वही सच्चा प्रेमी है। जो खुद जलकर भी जहाँ को रोशन कर दे, वही तो सच्चा प्रेमी है। जो खुद की चाहत से बढकर प्रेमी का हित देखे, वही तो सच्चा प्रेमी है। भले ही प्रवेश अचिंत्या को अपनी मित्र समझता है, पर अचिंत्या वास्तव में मित्र से बहुत आगे है जो प्रवेश को उसका लक्ष्य दिखा देगी।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
