संध्या की गवाही पर सभी अपराधियों को कठोर सजा मिली। दुर्भाग्य से मनोज तथा ज्योति को ताउम्र जेल की सलाखों के पीछे रखने का निर्णय सुनाया गया। निर्णय को सुनते ही दोनों फूट फूट कर रोने लगे।
   अपराध की दुनिया तक मनोज ज्योति को लेकर आया था अथवा ज्योति ने मनोज को प्रोत्साहित किया न था, इस विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता। बुरे काम का नतीजा बुरा ही होता है। मनुष्य को जीवन में सुधरने के अनेकों मौके मिलते हैं। पर उन मौकों को भुना पाना भी एक कला है। ज्यादातर तो अपनी शक्ति और बुद्धि के मद में चूर अच्छे राह को कमजोरी का पर्यायवाची ही समझते हैं।
   मनोज को सजा होने का सबसे बुरा प्रभाव कस्तूरी देवी की सेहत पर पड़ा। संभवतः यही एक माॅ का प्रेम है कि मनोज द्वारा खुद को असहाय स्थिति में छोड़ देने के बाद भी उनके मन में मनोज के लिये प्रेम कम था। तथा विषम परिस्थितियों में भी संध्या द्वारा उन्हें सहारा देने के बाद भी कस्तूरी देवी के मन में संध्या के प्रति कड़वाहट ही रही, यही भेदभाव कहलाता है।
   अपने पुत्र के गम में कस्तूरी देवी चिर निद्रा में सो गयीं। उनका विधिवत क्रियाकर्म भी प्रवेश के हाथों से कराया गया। मनोज तथा ज्योति के बेटे प्रद्युम्न को भी संध्या ने तलाश लिया। प्रद्युम्न भी अपराधियों के हाथ की कठपुतली बन बाल अपराधी के रूप में शिक्षण ले रहा था। कच्ची मिट्टी को कोई भी शक्ल दी जा सकती है। पकने के बाद फिर बदलाव नहीं होता। जिस बाल मन में शिक्षा की अलख जगनी चाहिये, वह अपराध का शिक्षण पा रहा था। अभी संध्या चाहकर भी उसका कोई भला नहीं कर सकती है। बाल सुधार गृह से वापस आने के बाद ही उसके विषय में कुछ सोचा जा सकता है।
   गांव में सोहन और शोभा के एक पुत्र हुआ। परिवार में सभी की खुशियों का कोई पार न था। पर इस समय जो सबसे अधिक खुश था, वह थे शोभा के पिता ठाकुर हरनाथ सिंह। आखिर अनेकों परेशानियों के बाद भी उनकी पुत्री का घर बस गया। उनकी पुत्री के जीवन में संतान का आगमन शोभा के प्रति उसके पति के प्रेम का द्योतक था।
   समय के साथ साथ अनेकों घटनाएं होती गयीं जो कि जीवन का अंग हैं। लक्ष्मी ने भी अपनी उच्च शिक्षा पा ली। उसके लिये अनेकों पढे लिखे लड़कों के रिश्ते आये। आखिर लक्ष्मी की राय से ही उसका विवाह कर दिया गया। वह अपने परिवार में खुशी खुशी जीवन जीने लगी।
   दूसरी तरफ मनोज और ज्योति के पुत्र प्रद्युम्न ने बाल सुधार गृह से वापस आने के बाद पढाई में कोई रुचि नहीं दिखाई। वैसे भी शिक्षा एक साधना है। जो कि एक बार टूट जाने के बाद आसानी से आरंभ नहीं होती है। पर लगता है कि अपराध की दुनिया में खुद के माता पिता के अंजाम को देख प्रद्युम्न कुछ सजग हो गया। वैसे कहा कुछ नहीं जा सकता है। बचपन के संस्कार कभी भी जाग्रत हो सकते हैं। यदि ईश्वर की कृपा से प्रद्युम्न का विवेक स्थायी रहा तो बिना पढे लिखे होने के बाद भी उसके जीवन जीने की अनेकों राह हैं। इस समय तो वह गाड़ियों को सही करने बाले गैराज में काम सीखने लगा है।
  अपनी जाबाजी तथा ईमानदारी के कारण संध्या ने अनेकों प्रमोशन पा लिये ।कभी सब इंस्पेक्टर के पद पर सेवानिवृत्त सैनिक कोटा में पुलिस विभाग जोइन करने बाली संध्या अब सहायक पुलिस कमिश्नर बन चुकी है। पदभार बढने के साथ साथ उसकी जिम्मेदारी भी बढ चुकी है। उसका स्थानांतरण अनेकों जिलों में होता रहता है। इस समय वह प्रवेश को हर जगह लेकर नहीं जा सकती है। फिर प्रवेश के भविष्य का ख्वाब भी वह देखने लगी है। भविष्य में प्रवेश भी अपने पिता की तरह देश का सिपाही बनेगा। प्रवेश का दाखिला सैनिक स्कूल में करा दिया। जहाँ वह पढाई के साथ साथ सैनिक जीवन की आरंभिक तैयारी करने लगा।
   संध्या जानकी देवी को अपने साथ ही रखती आयी है। हालांकि अब जानकी देवी की आयु बहुत हो चुकी है। पर संध्या की अच्छी देखरेख में वह अभी भी जीवन का आनंद ले रही हैं।
   अब लगने लगा है कि शायद कहानी अपने अंतिम समय पर है। जल्द ही प्रवेश सेना जोइन कर लेगा। फिर उसकी शादी कर दी जायेगी। दुनिया के रंग की कहानी अपना लक्ष्य पा लेगी।
  पर सच्चाई यही है कि कभी भी किसी को लक्ष्य आसानी से कब मिला है। लक्ष्य के नजदीक होने पर भी अनेकों बार लक्ष्य दूर रह जाता है। अनेकों बार हाथ में आती सफलता हाथ से निकल जाती है।
   मनुष्य के मन के ख्वाव आसानी से कब पूरे होते हैं। जीवन समर की आंधी में अनेकों बार लक्ष्य की लौ बुझती सी दिखने लगती है। अनेकों बार बचपन के संस्कार भी संगति के प्रभाव में धूमिल होने लगते हैं। तथा अनेकों बार सुसंगति के बाद भी बचपन के कुसंस्कार सर उठाने लगते हैं।
   वैसे प्रेम हमेशा मनुष्य को उसके लक्ष्य की तरफ पहुंचता है। पर अनेकों बार मनुष्य प्रेम के जाल में अपने लक्ष्य को ही भूल जाता है। अनेकों बार वह बचपन से दिखाये जाते लक्ष्य को अपना लक्ष्य भी नहीं मानता है। अनेकों बार मनुष्य तथाकथित प्रेम के लिये अपने माता पिता के स्वप्नों को भी भूल जाता है।
   प्रेम मनुष्य को हमेशा ऊपर उठाता है। जो मनुष्य को स्वार्थ के भ्रमर में लपेट दे, उसे प्रेम तो नहीं कहा जा सकता है। मनुष्य वासना को ही प्रेम समझ लेता है। फिर धोखा खाता है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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