पूरा जीवन चालाकी कर जीते आये, चतुरता के मद में मूर्ख अक्सर समझ ही नहीं पाते कि जिसे वे खुद की चालाकी समझ रहे हैं, वह उनकी मूर्खता है। उन्हें ध्यान ही नहीं रहता है कि जिस तरह वे दूसरों को मूर्ख बनाते रहे हैं, कोई और भी उन्हें मूर्ख बना सकता है। खुद की बुद्धि के सामने कभी भी किसी को कुछ न समझने बाले जिस आचरण को अपनी बुद्धि का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण समझते हैं, वास्तव में वही उनकी बुद्धिहीनता का सबसे बड़ा उदाहरण होता है।
मनोज और ज्योति दोनों ही संध्या की जमानत पर रिहा हुए थे। उनकी पूरी जिम्मेदारी संध्या की ही बन रही थी। वे दोनों ही बिना बताये गायब हो गये। यह सोचे बिना कि संध्या किस तरह परेशानी में पड़ेगी। वैसे भी उन दोनों के लिये संध्या की परेशानी कोई महत्व नहीं रखती थी। संध्या को परेशानी में पड़ा देख दोनों खुश ही होते।
संध्या की परेशानी से मनोज और ज्योति के अतिरिक्त कस्तूरी देवी भी प्रसन्न थी। प्रसन्नता की स्थिति में दवाएं भी अधिक असर करती हैं। संध्या की अपनी नौकरी की चिंता कस्तूरी देवी के लिये टानिक का काम कर रही थी। अब अक्सर वह दर्द में नहीं चीखती थी। फिर भी उसकी तेज आवाज अक्सर संध्या को बद्दुआ देती अवश्य सुनायी दे जाती। ईश्वर सभी के कर्मों का फल देते हैं। जिस नौकरी के गुमान में अपने सगे भाई को जेल में डालने जा रही थी, आज उसी नौकरी को बचाना मुश्किल हो रहा है। अभी तो देखिये। जिस तरह तेरा भाई दर दर की ठोकरें खा रहा है, तू भी उसी तरह ठोकर खायेगी।
सत्यता तो यही थी कि कस्तूरी देवी की तबीयत कहीं से ठीक न थी। पर हर्षातिरेक में वह अपनी दुर्दशा को भी भूल रही थी। भूल रही थी कि उसका बार बार बेटी को ही दोष देता रहना उसके जीवन को और भी अधिक कष्टों में डालेगा। इस समय वह संध्या के घर रह रही है। तथा संध्या की सास व भतीजी के मन से अपना सम्मान खोती जा रही है। प्रवेश भी पूरी तरह अपनी दादी के ही पास रहता है। बुढापे में छोटे बच्चों का साथ बुढापे को बचपन में बदल देता है। अनेकों बार स्वार्थ में मनुष्य नदी के किनारे बैठकर भी प्यासा मर जाता है।
एक बात सत्य थी कि यदि मनोज और ज्योति न मिले तो संध्या की पुलिस विभाग की नौकरी जा सकती है। पर क्या वह दर दर की ठौकर खायेगी। आज वह अपने ससुराल की प्यारी बहू है। उसके पति का मद भी उसके पास सुरक्षित है। वैसे भी कर्मयोगी कभी भी नहीं रुकते। पर संध्या की नौकरी जाने की अवस्था में दर दर की ठोकर यदि कोई खायेगा तो वह केवल कस्तूरी देवी ही। इतना स्पष्ट समीकरण होते हुए भी कुछ लोग इसे समझते नहीं हैं तो उसका कारण केवल और केवल कुछ लोगों की अति अच्छाई का होना ही है। विंषम से विषम परिस्थितियों में भी संध्या उसका पालन करेगी ही, मन में यह बात गांठ बांध लेना ही प्रमाण है कि संध्या अच्छाई की राह पर बहुत आगे है।
संध्या को मूर्ख बनाकर या खुद मूर्ख बनकर मनोज और ज्योति उस ठिकाने की तरफ बढ रहे थे जहाँ उस जैसे अनेकों युवक और युवतियां विभिन्न अपराधों द्वारा अपना जीवन यापन कर रहे थे। सच्चाई यही है कि केवल दो लोग ही इतने बड़े अपराध को अंजाम नहीं दे सकते। ऐसे बड़े अपराधों के लिये वास्तव में बड़ा गैंग होगा। ऐसे गैंग अनेकों शहरों में काम करते हैं। समाज में अनेकों सफेद पोशों के चेहरे भी इन कालिखों से काले होते हैं।
मनोज और ज्योति की गिरफ्तारी के बाद भी अनेकों शहरों में इसी तरह की घटनाओं का होना इस बात का प्रमाण है कि अपराध की फुलवारी अभी भी महक रही है। इन अपराधों का केंद्र कहाॅ था, क्या इस अपराध में पुलिस विभाग के भी कुछ लोगों की संलिप्तता है, ऐसे अनेकों प्रश्न विचारणीय थे।
पुलिस विभाग में भी अधिकांश यही समझ रहे थे कि संध्या निलंबित है। यह कुछ ही खास लोगों को ज्ञात था कि संध्या वास्तव में कमिश्नर के निर्देश में एक खास मिशन को अंजाम दे रही है जिसकी जानकारी कुछ ईमानदार अधिकारियों के अलावा किसी को नहीं है।
मनोज और ज्योति भूल रहे थे कि जिस तरह वह बहन संध्या को धोखा देते रहे हैं, उस तरह एक पुलिस अधिकारी संध्या को धोखा देना असंभव है। सच्चाई तो यही थी कि संध्या ने कभी भी धोखा नहीं खाया था। जो रिश्तों का लिहाज करते हैं, वे छोटी मोटी बातों को इग्नोर करते हैं। जिससे एक भ्रम की स्थिति बनती जाती है। समझदार को भी मूर्ख मान लिया जाता है।
आखिर जिस उद्देश्य से संध्या ने मनोज और ज्योति की जमानत करायी थी, वह पूर्ण हुआ। एक बड़ा गैंग संध्या के नैत्रत्व में पुलिस की खास टीम ने पकड़ा। लाकअप में जब उन सभी की खातिरदारी की गयी तो और भी कड़ियाँ जुडती गयीं। अनेकों चोरी के स्वर्ण आभूषण खरीदने बाले सुनारों के साथ साथ पुलिस विभाग के भी कुछ बेईमान बेपर्दा हुए जिनके संरक्षण में इतना बड़ा अपराध फल फूल रहा था।
” संध्या। तुम और इतनी बड़ी धोखेबाज। बहन होकर भी भाई की मदद करना तो दूर, भाई की जमानत भी इसीलिये करायी ताकि अपराध और गहराई से सिद्ध कर सको। मैं तुमसे नफरत करता हूं।”
” सही कहा आपने ।जब खुद के दामन में ही खोट हो तो फिर किसी अन्य का क्या दोष। जब घर ही दुश्मन हों तो बाहर के दुश्मनों की क्या जरूरत। “
मनोज के साथ साथ ज्योति भी बोलने लगी। दोनों अभी भी संध्या को सीधा समझ रहे थे। अचानक दोनों के गालों पर थप्पड़ों की बरसात होने लगी। थोड़ी ही देर में दोनों अपने लाल गाल सहला रहे थे।
” मूर्खों। तुम्हें कितनी बार समझाया। कितनी बार बताया कि मेहनत कर ईमानदारी की जिंदगी जीइये। पर नाकरापन के कारण कभी कोई काम ही नहीं किया। खुद धोखा देने बाले दूसरों को दोष जरूर देते हैं। भूल रहे हों दोनों कि किस तरह तुमने मुझे धोखा दिया था। भूल रहे हो कि अभी भी मुझे धोखा देकर ही भागे हो। भूल रहे हो कि कुसंगति का शिकार रहे तुम्हें उन्हीं ने धोखा दिया है जिन्होंने कि तुम्हें इस कुमार्ग पर बढाने में मुख्य भूमिका निभाई थी। हाॅ ज्योति जी। तुमने पिता जी का घर बेचा, उसके पैसे किसने तुमसे छीन लिये। क्या मेंने ।अरे अक्ल के दुश्मनों। यदि समझने की जरा भी शक्ति होती तो तुम उसी समय अपनी भूल मान अपनी बहन के पास आते। निश्चित ही उस स्थिति में भी मैं तुम्हें जीवन जीने की राह बता देती। पर तुमने चुना अपराध का रास्ता। जो कि केवल और केवल जेल के द्वार पर ही खुलता है। भूल जाना कि मैं तुम्हारी बहन हूं। मैं अपराधियों से किसी भी तरह का कोई संबंध नहीं रखती। अब मैं जा रही हूॅ। मेरी टीम के दूसरे सदस्य तुम दोनों से पूछताछ करेंगें। इस बार तुम दोनों से ठीक उसी तरह पूछताछ की जायेगी जैसे कि एक पुलिस अपराधियों से पूछताछ करती है। यदि किसी भी प्रश्न का सीधे सीधे उत्तर नहीं दिया तो अपनी दशा के लिये तुम खुद जिम्मेदार रहोंगें। “
संध्या दोनों को लाकअप में बंद कर बाहर चल दी। मनोज और ज्योति का साहस अब कुछ बोलने का न था। चुपचाप खुद को उस पूछताछ के लिये तैयार करने लगे जो की अपराध की दुनिया की बड़ी सी इमारत को ढहाने के लिये आवश्यक होगी।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
