ठाकुर हरनाथ सिंह की कभी इलाके में बहुत इज्जत थी। हालांकि बहुत रईस न थे फिर भी निर्धनता जैसी कोई बात न थी। कस्बे के सरकारी अस्पताल में वह लैब टैक्नीशियन थे। इस लिये भी उनकी जान पहचान बड़े बड़े लोगों में थी। पर उनके जीवन में वास्तविक गौरव का क्षण उस समय आया जबकि उनकी बेटी शोभा ने इंटरमीडिएट की परीक्षा में बोर्ड में ऊपर स्थान पाया। शोभा का साक्षात्कार अखबारों में छपा। बेटी के कारण हरनाथ सिंह का सम्मान बहुत बढ गया।
शोभा का दाखिला अच्छे मैडीकल कालेज में हुआ। हालांकि शोभा को छात्रवृति मिलने लगी थी फिर भी हरनाथ सिंह ने उसके लिये खर्चों में कोई कौताही नहीं की। बेटी ने हजार रुपये मांगे तो पिता ने दो हजार भिजबाये। आखिर दूसरे शहर में बेटी को और कब पैसों की जरूरत पड़ जाये। फिर वह किसके सामने हाथ फैलायेगी।
काश शोभा एक डाक्टर बनकर हरनाथ सिंह के सम्मान को बुलंदियों पर पहुंचा पाती। काश शोभा ठाकुर समाज के लिये एक प्रेरणा बन पाती।
क्या हुआ। कैसे हुआ। किसका दोष। कह नहीं सकते। पर इतना निश्चित था कि यकायक मिली छूट से शोभा के कदम कुछ तो लड़खड़ा गये। अथवा शायद वह प्रेम और धोखे में भेद न कर पायी।
सत्य बात है कि किशोरावस्था में एक बेटी को माॅ के दिशानिर्देशों की अधिक आवश्यकता होती है। बचपन से ही मात्रविहीना शोभा कुछ डगमगायी जरूर पर जल्द ही उसे अपनी भूल का अहसास हो गया। जल्द ही वह समझ गयी कि वह जिसे प्रेम समझ रही है, वह वास्तव में धोखा था।
शोभा उस प्रेम में कितना आगे बढी, इस विषय में भी कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता है। शायद पूरा सत्य जानने की कोशिश भी नहीं की गयी। स्त्रियों को एकतरफा दोषी ठहराने की समाज की मानसिकता का शिकार शोभा हो गयी। शोभा की कहानी समाज में एक से दूसरे कानों तक पहुंची, तब अधिक बढकर ही पहुंची।
शोभा उसी समय से अपने घर पर है। अच्छी आयु हो जाने के बाद भी अविवाहित है। अवसाद में एक बार उसने आत्महत्या करने का भी प्रयास किया था। आज भी वह अपनी भूल पर शर्मिंदा होती है।
वैसे ठाकुर समाज ने हरनाथ सिंह और उसके परिवार का कोई सामाजिक बहिष्कार तो नहीं किया था। पर हरनाथ सिंह देख रहे थे कि कोई भी उन्हें किसी वैवाहिक आयोजन में नहीं बुलाता है। बाहर की तो बात अलग है, खुद उनके खास खास रिश्तेदारों ने उनसे दूरी बना ली है। कानून के भय से आजकल कोई भी समाज किसी का विधिवत बहिष्कार तो नहीं करता है। पर आज भी सामाजिक बहिष्कार होता है। रूप बदल गया है।
दुखद था कि यह दंड एकतरफा था। यद्यपि यदि शोभा के कृत्य को सामाजिक अपराध भी कहा जाये तो भी उस अपराध में वह अकेली तो नहीं थी।
रविवार का दिन था। आज हरनाथ जी अपने घर पर आराम कर रहे थे। वैसे जिस पिता की युवा पुत्री अविवाहित हो, वह आराम कब करता है । अवकाश के क्षणों का पूरा प्रयोग बेटी के लिये उपयुक्त वर की तलाश में करता है। पर हरनाथ सिंह यह नहीं कर सकते थे। वैसे कुछ वर्ष पूर्व तक उन्होंने दूर दूर प्रयास भी किये थे। पर हर बार शोभा की गाथा उनके वर के घर तक पहुंचने से पूर्व वहां पहुंच जाती थी। एक बार उनका दाव लग भी रहा था। अनजान लड़के बालों से बात भी हो गयी। पर फिर वही समाज। पता नहीं कि इतना छिपाने के बाद भी किसे जानकारी हो गयी। किसने लड़के बालों तक सारी बातें पहुंचा दीं। फिर लड़के बालों ने रिश्ता तोड़ने की घोषणा जिन गालियों के साथ की, आज भी हरनाथ सिंह के सपनों में वही गालियां गूंजती थीं। अब शोभा का विवाह तो ईश्वर के आधीन है। खुद को और अधिक अपमानित करा पाने में हरनाथ सिंह खुद को असमर्थ पाते।
लगता है कि शोभा का विवाह अब केवल ईश्वर के ही आधीन है। तभी तो आज शोभा का रिश्ता सोहन के लिये मांगने खुद सौदामिनी हरनाथ जी के घर आ पहुची है।
हरनाथ सिंह बहुत देर तक समझ न पाये। सौदामिनी ने स्पष्ट रूप से सारी बातें बतायी। सोहन का पूरा अतीत भी बताया। एक तरह से सोहन और शोभा दोनों ही एक सी स्थिति में थे। यह दूसरी बात थी कि पुरुष होने के कारण सोहन के कृत्यों पर कभी अंगुली नहीं उठी। समाज हमेशा और हमेशा स्त्री के चरित्र पर ही अंगुली उठाता है।
आरंभ में सौदामिनी का निर्णय सोहन को भी पसंद नहीं आया। मन की क्षुद्रता कि वह इसे सौदामिनी का बदला समझ रहा था। आखिर कभी उसने सौदामिनी से विवाह करने से मना जो किया था।
लगता है कि ईश्वर सोहन पर अनुकूल हो गये। सोहन को अपने विचारों पर घ्रणा आयी। वह अभी भी सौदामिनी के विषय में इस तरह सोच रहा है। जबकि खुद उसका चरित्र कोई उत्तम नहीं रहा है। फिर वह किसी स्त्री के चरित्र को किस तरह छोटा कह सकता है।
आखिर सोहन भी तैयार था, सोहन के माता पिता को भी सौदामिनी के निर्णय पर विश्वास था। फिर भी ठाकुर समाज परिवार का प्रतिवाद कर रहा था। जिसकी उन्होंने परवाह नहीं की। समाज केवल उन्हीं का विरोध करता है जो कि विरोध के सामने झुक जाते हैं। समाज की बुराई के सामने खड़े रहने बाले साहसी खुद समाज की दिशा तय करते हैं।
आखिर एक बहुत साधारण आयोजन के बाद शोभा सोहन की पत्नी बनकर आ गयी। उम्मीद है कि एक न एक दिन शोभा की सदाचारता को समाज भी स्वीकार करेगा। उम्मीद है कि एक लड़की का जीवन संवारने का कार्य कर सोहन भी सन्यास की सही अवधारणा के मार्ग पर चलने लगेगा जहाँ सन्यास का अर्थ केवल और केवल त्याग और विश्व कल्याण है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
