सोहन को अपने सामने देख सरस्वती न तो घबरायी और न ही कुछ ऐसा लगा कि वह आत्मग्लानि की ज्वाला में जलने लगी है और न ही उसने सोहन को देख अपनी नजरें फेरीं। अक्सर मनुष्य अपने मन के भावों को छिपाने के लिये दूसरी तरफ नजर कर लेता है। खुद को अपरिचित दिखाने लगता है।
   लगता है कि यह सरस्वती का धैर्य था कि आफिस में भी वह सोहन से आसानी से मिल पायी। अपने सहकर्मियों को उसने सोहन का परिचय परिवार के देवर के रूप में कराया। उस दिन अपने अधिकारियों से बोलकर जरा जल्दी ही घर चल दी।
  आफिस और घर के मार्ग में भी वह खुद को संयमित रखे रही। न तो वह सोहन के प्रति उदासीन लग रही थी और न ही उसके प्रति अति आकर्षित।
   माना जाता है कि स्त्रियां अपने मन के भावों को अक्सर छिपा नहीं पातीं। पर आज सरस्वती के मन के भावों का सही सही आकलन कर पाना आसान न था। लगता है कि उसने अपने मन के सागर में अपने सारे भावों को छिपा दिया है। उस सागर की गहराइयों से कोई कुशल गोताखोर ही उन्हें बाहर ला सकता है।
  आज सोहन को सरस्वती बहुत बदली बदली सी भी लगी। वह तो नये नये कपड़ों और महंगे गहनों की शौकीन थी। सिंगार में खुद को ही भूल जाने बाली। आज वही सरस्वती अपनी नैसर्गिक सुंदरता से किसी को भी लुभा सकने में सक्षम थी। सचमुच किसी भी व्यक्ति की सुंदरता उसके व्यक्तित्व में होती है। सोहन को आज सरस्वती, उस युवती सरस्वती से भी अधिक सुंदर लगी जिसके प्रेम में वह पागल रहा करता था।
    घर पहुंचकर दोनों बच्चों रश्मि और रंजन से सरस्वती ने सोहन का परिचय कराया। दोनों बच्चे बहुत कम ही गांव गये थे। पर जब भी गये थे, उन्होंने सोहन को कभी नहीं देखा था।
   कुछ समय पूर्व तक हर संबंध को धन की तराजू पर तौलते दोनों बच्चे अपेक्षाकृत अधिक समझदार हो चुके थे। पिता के निधन के बाद कुछ समय उन्हें दादा और दादी का साथ मिला था। अभी भी लगभग हर रोज अपने दादा और दादी से फोन पर बात कर लेते थे। दूर होने पर भी ताई की हर बात को मानने का प्रयास करते थे।
   लक्ष्मी देवी की उपासना में जो बच्चे भावनात्मक रूप से कुछ दूर हो चुके थे, अब प्रेम और अनुशासन की डोर में बंधे परिवार और रिश्तों की अहमियत समझने लगे थे। बच्चों ने अपने रिश्ते के चाचा का उसी तरह स्वागत किया, जैसे कि उनके सगे चाचा हों। हालांकि दोनों बच्चों को सोहन और सरस्वती के अतीत के विषय में कुछ भी जानकारी नहीं थी। सोहन के आगमन का उद्देश्य समझ पाने की स्थिति में दोनों ही नहीं थे। पर सरस्वती शायद समझ रही थी। फिर भी वह खुद से शांत थी।
  सोहन तीन दिन सरस्वती के घर रुका। हर सुबह सरस्वती अपने आफिस निकलती और शाम को वापस आती। बच्चे सोहन का ध्यान रखते। जिस काम के लिये वह आया था, अब समझ नहीं पा रहा था कि उसकी चर्चा किस तरह करे। तीन दिनों के साथ के बाद भी सरस्वती ने अपनी कोई मर्यादा नहीं तोड़ी। हालांकि इस दौरान सोहन का मन अनेकों बार मर्यादा के बांध तोड़ने को उतारू हुआ।
   आखिर हिम्मत कर सोहन ने अपने मन की बात खुद ही सरस्वती से कह दी। उसे उम्मीद थी कि उसकी तरफ से पहल के बाद सरस्वती जरूर उसका अनुरोध स्वीकार कर लेगी।
  सरस्वती कुछ देर शांत रही। फिर कहने लगी।
  ” सोहन। अब हमारा जीवन बहुत आगे बढ चुका है। मैं निश्चित ही संध्या दीदी और सौदामिनी दीदी की तरह बहुत बड़ी सोच की स्त्री नहीं हूं। मुझे अपनी कमियां पता हैं। निश्चित ही मेरा मन इतना पवित्र नहीं है कि वह निर्विकार रह सके। यह भी सत्य है कि आपको देखकर मुझे पुरानी अनेकों बातें स्मरण हो आयीं हैं।
  नदी हो या स्त्री। अपनी मर्यादा में रहते हुए संसार का उपाकर कर सकते हैं। जब भी ये मर्यादा त्यागते हैं, एक बाढ आती है। जो बहुत कुछ बहा ले जाती है।
   आराम से पुरुष समाज को दोष दिया जा सकता है। पुरुष वर्चस्व बाले समाज ने कभी भी महिलाओं के मन का विचार नहीं किया। सारे नियम महिलाओं के विरोध में बनाये। तथा पीढी दर पीढी उन्हीं नियमों को मानतीं आयीं महिलाएं उन नियमों का विरोध करने का साहस नहीं कर पायीं।
  सत्य तो यह है कि एक महिला की जिम्मेदारी एक पुरुष से कुछ अधिक है। जहाँ एक पुरुष के आचरण से वह केवल खुद का नुकसान करता है। वहीं एक स्त्री अपने आचरण से अपने परिवार का भी नुकसान कर देती है।
   मैं कभी आपकी प्रेमिका थी। मैंने उस समय आपको प्रेम किया था या मैं आपको धोखा दे रही थी। आज की परिस्थितियों में इन बातों का कोई मोल नहीं है।
  आज मैं आपके चचेरे भाई की विधवा हूं। संभव है कि मेरा उनसे संबंध भी सुख सुविधाओं की चाह में हुआ हो। भले ही सात जन्मों तक साथ की अवधारणा पर मुझे विश्वास नहीं है। फिर भी एक सत्य है कि मेरा एक कदम मेरे बच्चों पर बहुत प्रभाव छोड़ेगा।
  निश्चित ही बच्चे अभी सब नहीं जानते। पर कभी तो जानेंगे। जीवन के राज कभी तो उनके सामने आ जायेंगे।
   फिर बच्चों के मन में क्या धारणा बनेगी। उनकी माॅ ने उनके पिता की मृत्यु के बाद अपने पूर्व प्रेमी से विवाह कर लिया। अर्थात मम्मी के मन में हमेशा अपने पूर्व प्रेमी से प्रेम था।
   बच्चे न चाहते हुए भी वही आचरण दोहराने लगेंगे । प्रेम में निष्ठा और समर्पण के सिद्धांतों को वह तिलांजलि देने लगेंगे। संभव है कि उनका परिणाम ठीक न रहे। इन्हीं बातों की तिलांजलि देने का परिणाम तो आज मेरा वैधव्य है।
  मैं अपने पति का जीवन तो बचा नहीं पायी। पर अपने बच्चों को जीवन की सही राह जरूर दिखाऊंगी। इसके लिये जरूरी है कि मैं अपने जीवन से बढकर अपने बच्चों के जीवन को समझूं।
  आज मैं आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रही हूं कि आप मेरे पास कम आया करें। निश्चित ही मेरा मन कमजोर है। यदि बहक गया तो बच्चों का जीवन खराब हो जायेगा। यदि आपने कभी भी मुझे प्रेम किया है तो उसी प्रेम का वास्ता। अब मैं और आप दूरी बनाकर रहेंगे। किसी आयोजन में मिलेंगे तो भी केवल परिवार के एक सदस्य की तरह। “
  सोहन का मन वैचैन हो उठा। एक बार फिर से उसकी इच्छा पहली तरह सन्यास की तरफ भागने की थी। पर इस बार वह सन्यासी बनने नहीं जा सकता था। न जाने क्यों सौदामिनी ने उसे माता पिता की शपथ देकर वापस घर आने को कहा था। उस समय सोहन को इसमें कोई अचरज नहीं हुआ था। आखिर वह घर ही तो आयेगा। और अकेला भी नहीं। अपनी जीवन संगिनी के साथ। 
  लगता है कि सौदामिनी उस स्थितियों से अधिक परिचित थी। लगता है कि वह जानती थी कि सोहन को सरस्वती का भी साथ नहीं मिलेगा। शायद वह जानती थी कि सोहन एक बार फिर से कोई गलत कदम उठा सकता है। 
   सोहन कुछ भी कर सकता है। पर अपने माता पिता के नाम दी कसम को तोड़ नहीं सकता है। वह वापस घर जायेगा। इस बार वह माता पिता की आज्ञा लेकर सन्यास के पथ पर आगे बढेगा। 
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *