बड़े खुश थे सभी
चुप रहा करते थे जब तक,
जरा सी जुबान जो खोली
तो शिकवे हजार हो गये।
बड़ी तारीफें होती थी
जब करते थे सबके मन की,
कभी जो अपने लिए किया 
तो अफसाने हजार हो गये।
बड़ा पसंद था साथ सबको
खर्च करते थे जब खुलकर,
जरा सी मुट्ठी क्या बंद की
तो लोग दरकिनार हो गये।
बड़े चर्चे थे दरियादिली के
मदद जब करते थे सबकी,
एक बार जो हमने मांग लिया
तो बहाने हजार हो गये।
बड़ा याद करते थे सब
काम पड़ता था जब तक,
जरा सा बेकार क्या हुए
तो दर्शन भी दुश्वार हो गये।
बड़ा इतराते थे सभी
तारीफें जब तक निकलती रही,
आलोचना जो एकाध निकली
तो फासले हजार हो गये।
साथ निभाने के थे वादे
पक्ष में थे हालात जब तक,
वक्त जो खिलाफ हुआ जरा सा
तो गायब सरकार हो गये।
पूछी जाती थी हर पसंद
कभी कभी जो आते थे,
निवासी हुए जब से पक्के
तो पुराने अखबार हो गये।
अपने हाथों से सींचा था
जिन फूलों को बड़े प्यार से,
बड़े जरा से क्या हुए
तो कांटे बेशुमार हो गये।
स्नेह के धागों से
बंधे थे रिश्ते अब तक,
अक्लमंद जरा से क्या हुए
तो सब दुनियादार हो गये।
            जितेन्द्र ‘कबीर’
            
यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है।
साहित्यिक नाम – जितेन्द्र ‘कबीर’
संप्रति – अध्यापक
पता – जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश
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