सड़कों पर कभी उत्पात मचाता कभी लोगों पर पत्थर फेंकता तो कभी बेगुनाहों के खून से होली खेलता जी हां यही पहचान है दिग्भ्रमित युवा की ।पथभ्रष्ट होशो हवास खो कर किसी की भी बिछाई बिसात का मोहरा बन जाना युवाओं की आदत हो चुकी है ।पैसा कमाने का शॉर्टकट और निजी स्वार्थों और आवश्यकताओं को पूर्ण करने का भूत  कुछ इस तरह सवार है कि पागल भीड़ का हिस्सा बनने से भी गुरेज नहीं रहा। बुद्धि है, ज्ञान है ,प्रतिभा है, हुनर है ,तकनीकी का ज्ञान है लेकिन कमी है तो सिर्फ धैर्य और स्व विवेक की । अपने ज्ञान और हुनर का उपयोग बहकावे का शिकार होकर गलत दिशा में करना उचित नहीं है ।अपनी शक्ति ,अपनी अपार ऊर्जा अदम्य साहस सबकुछ राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में लगा देना सिर्फ राजनीतिक पार्टियों के प्यादे बनकर यह सरासर नैतिकता का अवमूल्यन है। आज का युवा पहले से ज्यादा समझदार व्यवहारिक ज्ञान की समझ रखने वाला चौकस ,चौकन्ना*अपडेट*युवा है। 
लेकिन फिर भी दिग्भ्रमित है यह शर्मनाक चिंतनीय और खेद जनक है। भारत की संस्कृति संस्कार गरिमा का ध्यान रखते हुए युवाओं को इस देश के कर्णधारो को अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझने की महती आवश्यकता है।
        प्रीति मनीष दुबे 
        मण्डला मप्र
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