दूल्हा चला करने, शुभ विवाह
निकला घोड़े के सवारी पे बन- ठन के
मदमस्त हो खुद में, न किसी की परवाह
खुश है दूल्हे का पिता ,चेहरा भी ऐसे दमके ।।
मिल गई पढ़ी-लिखी सुंदर कन्या
भारी-भरकम दहेज, नोटों के साथ
उच्च शिक्षित,अफसर बेटे के लिए
मांगा है जो सुयोग्य कन्या का हाथ ।।
ताउम्र रहेगा खुश, मेरा बेटा
निजी जरूरतें भी पूरी हो पाई
अब न कोई चिंता रह गई 
कर आए बेटे के ,खर्चों की भरपाई ।।
दहेज लोभियों को, मुबारक हो ऐसी शादियां
आंसू भी नजर न आए ,पिता की भरी अखियां
मेहनत के पैसों को ,संजोकर जो रखा था
भविष्य की खातिर, खरीदने बेटी की खुशियां ।।
आख़िर बेबस एक पिता ने 
दहेज की तर्ज़ पर बिटिया को बिदा किया……….
              मनीषा भुआर्य ठाकुर (कर्नाटक)
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