महात्मा गौतम बुद्ध का नाम बचपन में सिद्धार्थ था। ये स्वयं एक महान राजा शुद्दोधन के लड़के और एक राजमहल के राज कुमार थे।एक बार का प्रसंग है इनके चाचा के लड़के देवदत्त ने एक एक हंस पर अपना बाण चलाया और हंस घायल होकर ज्यादा उड़ न सका वह जाकर राजकुमार सिद्धार्थ के पास जा गिरा। 
जीवों पर दया दृष्टि रखने वाले राजकुमार सिद्धार्थ ने उस पर दया कर उठाया,उसका बाण निकाला,बहते हुए खून व घाव को धुला और उसकी मरहमपट्टी किया तथा उसकी जान बचाया। देवदत्त अपने शिकार की खोज करते हुए सिद्धार्थ के पास आये और अपना शिकार हंस उनसे मांगने लगे,किन्तु राजकुमार सिद्धार्थ ने कहा कि हम हंस नहीं देंगे हमने इसकी जान बचाया है।इस बात पर दोनों में बहस होने लगी,जब बहस ज्यादा बढ़ गयी तो राज्य के लोगों ने यह बात राजा तक पहुंचाई।
यह बात जब राजा तक पहुंची तो राजा ने दोनों को दरबार में बुलाया और राजा के सामने दोनों ने अपनी अपनी बात रखी। राजा ने दोनों की बात ध्यान से सुनने के बाद अपने न्यायपूर्ण फैसले में कहा-
“मारने वाले से बचाने वाले का अधिकार बड़ा होता है।”
प्रिय देवदत्त इस हंस पर अब तुम्हारा कोई भी अधिकार नहीं है,क्योंकि तुमने इस पर अपने बाण चला कर इसे मारना चाहा और सिद्धार्थ ने इस घायल हंस की जान बचाई है।
राजकुमार सिद्धार्थ बचपन से ही धार्मिक विचार और प्रभु के मार्गी थे।समय के साथ राजकुमार सिद्धार्थ बड़े हुए और उनका शादी विवाह भी हुआ,इनसे इनकी पत्नी को एक बच्चा भी हुआ।बच्चा अभी बहुत छोटा ही था,किन्तु सिद्धार्थ का मन पत्नी प्रेम और बच्चे के मोह, राज पाट और वैभवशाली जीवन में नहीं लग रहा था,वे सदैव ईश्वर के प्रति सोचते रहते थे। एक दिन वे सब कुछ छोड़ छाड़ कर अपना राजमहल त्याग कर भविष्य सन्यासी जीवन धारण करने हेतु और ज्ञान प्राप्ति की तलाश में निकल पड़े,फिर कभी वह वापस अपने राजमहल नहीं लौटे।
यहाँ एक बात विशेष गौर करने वाली और सब के जानने के लिए जरुरी है।वह यह है कि गौतम बुद्ध का जन्म भी पूर्णिमा को हुआ। उनको परम ज्ञान भी पूर्णिमा के दिन ही प्राप्त हुआ।यही नहीं उनका परिनिर्वाण भी पूर्णिमा के दिन ही हुआ।इसी लिए इस विशेष पूर्णिमा को त्रिपावनी बुद्ध पूर्णिमा भी कहते है। गौतम बुद्ध ने ही धम्म की स्थापना की जिसका अर्थ धर्म नहीं बल्कि जीने का एक सच्चा और सरल रास्ता। उनकी दृष्टि में सभी मनुष्य एक सामान हैं।किसी पर जीत के लिए युद्ध जरुरी नहीं बल्कि बुद्ध यानि बुद्धि की जरुरत होती है।मनुष्य के बुद्धि,विवेक और ज्ञान में वो शक्ति होती है जो किसी के भी ऊपर यहाँ तक कि अंगुलिमालि जैसे डाकू के ऊपर भी विजय प्राप्त कर सकती है।
परम ज्ञान की खोज और प्राप्ति में ही वे अपने जीवन पर्यन्त लगे रहे और ज्ञान प्राप्ति के बाद अपने जीवन को सार्थक बनाते हुए अपने अंतिम समय परिनिर्वाण के समय दुनिया को यही सन्देश दिया।
“बुद्धम शरणम गच्छामि। धम्मम शरणम गच्छामि।संघम शरणम गच्छामि।”
महात्मा गौतम बुद्ध ने कहा है “अगर हम किसी के जीवन में उसके दुःख का कारण हैं तो हमारा यह जीवन व्यर्थ है,किन्तु यदि हम किसी के जीवन में उसके सुख का कारण बनते हैं तो ही हमारे जीवन का सच्चा अर्थ है।”
आज विश्व के लगभग 200 देशों में बौद्ध धर्म और धम्म के अनुयायी हैं,और उनके बताये गए मार्ग पर चल रहे हैं। सारनाथ,कुशीनगर,साँची आदि अनेकों स्थान पर देश विदेश में बौद्ध स्तूप बने हुए हैं,जहाँ नित्य लोग दर्शन करने और शांति प्राप्ति करने हेतु जाया करते रहे हैं।
आइये,हम सब भगवान गौतम बुद्ध की जयंती यानी जन्मदिवस “त्रिपावनी बुद्ध पूर्णिमा” के इस पावन पर्व पर हम सभी यह संकल्प लें कि हमारे मन,कर्म और वचन से हम सब मानवता का धर्म निभाएंगे और किसी भी प्राणिमात्र को कोई भी कष्ट नहीं होने देंगे।
हम अपने हाथों समाजहित के लिए सुन्दर -2 अर्थपूर्ण परोपकार करेंगे,निरीहों की सेवा करेंगे और अपने बल से किसी निर्बल को सतायेंगे नहीं बल्कि उसका उपकार करेंगे। अपने जीवन को हम ईश्वर कृपा से मनुष्य रूप में जन्म लेने के इस सुअवसर को सफल बनाएंगे तथा सत्य का मार्ग अपनाएंगे। बुद्ध के दिखाये मार्ग पर चलते हुए आगे बढ़ते जायेंगे।
आप सभी को इस पावन पुनीत शुभ दिन बुद्ध पूर्णिमा की बहुत बहुत हार्दिक बधाई एवं शुभ मंगल कामनायें।
आलेख :
डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पी बी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ प्र.
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