तो वो यह सोचते हैं कि,
यह जो कुछ हुआ,
उनकी बदौलत हुआ,
कर्म मैंने किया और,
नाम उनकी बदौलत हुआ।
दुनिया को बता रहे हैं वो,
अपने अहसानों को,
सबको सुना रहे हैं वो,
अपने कर्ज को मुझ पर।
मगर, 
बेकार समझकर कल तक तो,
उन्होंने तोड़ दिए थे सारे रिश्तें,
सड़ा हुआ फल समझकर,
मुझको फैंक दिया था सड़क पर।
और आज,
उस सड़े फल में महक देखकर,
हीरे के समान उसकी कीमत जानकर,
बसाना चाहते हैं उसको अपने दिल में।
बता रहे हैं अब,
दुनिया को उसको,
अपने खून से सींचा बाग,
पीयें थे अपने आंसू – गम,
उसको आबाद करने के लिए।
कर रहे हैं अब मेरी तारीफ,
दे रहे हैं मुझको सम्मान,
मेरी सफलता और तरक्की पर,
दुनिया से यह कहकर, 
कि हमारे परिवार का अंग है।
तो वो यह सोचते हैं कि
शिक्षक एवं साहित्यकार-
गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद
तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)
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