आखिर कुछ भी तो खास नहीं, तेरी तस्वीरो- कहानी में।
कैसे तु भूल गया है होश, फिर ऐसे जोशो- जवानी में ।।
आखिर कुछ तो ———————–।।
डोल रहा है कली कली, नहीं मन काबू कुछ भी तुमसे।
झूल रहा है झूलों में, नहीं मतलब तुमको हकीकत से।।
पल में तु रंग बदलता है, नहीं सच तेरी जुबानी में।
आखिर कुछ भी तो————–।।
देता है नसीहत औरों को, नहीं छोड़ो इमानो- वफ़ा।
नहीं करो पाप , नेक बनो, ताकि तुमको हो नफा।।
लुटा है सबको तुमने लेकिन, देकर धोखा जिन्दगानी।
आखिर कुछ भी तो ——————-।।
तुमने किया है बर्बाद, मुफ़लिस -मासूम- यतीमों को।
पाई है तुमने यह शौहरत, लूटकर अपने ही भाइयों को।।
अफसोस नहीं तुमको कुछ भी, करके खूं दाना- पानी में।
आखिर कुछ भी तो  ——————-।।
तुमको है मस्ती जवानी की, तुमको है नशा जवानी का।
क्या है अच्छा और बुरा,नहीं ख्याल तुम्हें ज़िन्दगानी का।।
कहता है फिर तु खुद को खुदा, करके खता तु हैवानी।
आखिर कुछ भी तो—————-।।
रचनाकार एवं लेखक- 
गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद
तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)
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