शाम से ही बारिश हो रही थी। कभी रुक रुक कर और कभी तेजी से। रामचंद्र ज्यादा परेशान था। बारिश का मौसम वैसे उसे भी अच्छा लगता था। पर छत से पानी टफकने लगता तो बारिश की सुंदरता मन से गायब हो जाती। घर के जरूरी सामान को ठीक जगह करना और थोड़ी सी जगह सोने के लिये तैयार करने में रामचंद्र को बहुत देर लगी। फिर अपनी औरत मुनिया को पुकारने लगा। 
   ” मुनिया ओ मुनिया ।”
   मुनिया ने शायद सुना नहीं। रामचंद्र कुछ देर आवाज लगाकर चुप हो गया। मुनिया की यही बात उन्हें गलत लगती है। आदमी की आवाज को सुनकर नजरअंदाज कर देती है। वैसे मुनिया के प्रेम पर शक करने की बजह नहीं है। पर मुनिया की जिंदादिली रामचंद्र को थोड़ा अखर जाती। परेशानियों में आदमी परेशान होगा ही। औरतों का क्या है। घर को कैसे सुचारु रूप से चलाना है, यह देखना तो मर्दों का ही काम है। अगर चार दिन आदमी कमाकर न लाये तो औरतों को सब चंदा तारे दिख जायें। सब रास रंग भूल जायें। अभी इतना इतरा कर बोलती हैं कि घर को वही चलाती हैं। पर घर तो पैसों से चलता है जो आदमी कमाकर लाता है। 
   तभी पड़ोस से गानों की आवाज आने लगी। बारिश में गांव की औरतें मल्हार गाने लग जातीं। फिर उन्हें कुछ भी नहीं सूझता। क्या बूढी, क्या जवान। शादीशुदा या अविवाहित लङकियां। सब आनंद में खुद को भूल जातीं। हसी ठिठोली करतीं। बुढिया भी जवान बन जातीं।
   ज्यादातर घरों में सास और बहू में खटपट रहती। विवाद की कोई खास बजह नहीं होती। कई बार बर्चश्व की चाह विवादों को जन्म देती है। पर मल्हार ऐसे विवादों को शांत कर देता।
    काफी देर से सामान लगाते लगाते रामचंद्र थक गया था। थोड़ा चाय पीने की इच्छा हो रही थी। पर मल्हार की आवाज से समझ गया कि मुनिया शायद घर में नहीं है। कहीं भी नाच गाना हो और मुनिया वहाँ न जाये, यह कैसे हो सकता है। थोङी देर में परिचित आवाज सुनाई देने लगी
ओ पुरवाई 
हौले हौले आ
पिया दूर परदेश 
यों न तड़पा 
  मुनिया इस गाने को बङी तल्लीनता से गा रही थी। रामचंद्र को भी हसी आ गयी। 
   तो भाई। अब तो चाय मिलने से रही। थोड़ा आराम ही कर लिया जाये। लेटते ही आंख लग गयी। 
   सपने में बहुत सारे सपने दिखे । दूल्हा बना वह मुनिया को विदा कराके ला रहा है। अम्मा ने मुनिया की आरती की। फिर घर गृहस्थी की अनेकों बातें। फसल में पानी देना था। रामचंद्र की तबीयत खराब थी। पता चला कि मुनिया पानी दे आयी। और भी खुद के कितने कामों में उसे मुनिया की सहभागिता दिखाई देने लगी। पर मुनिया के किसी भी काम में वह खुद को नहीं पा रहा था। ठीक है कि उसने अभी घर का सामान व्यवस्थित किया है पर वह तो रात में सोने की जगह बनायी है। 
   अचानक रामचंद्र की नींद टूट गयी। अभी भी गानों की आवाज आ रहीं थीं। उठकर पहले तो एक कप चाय बनायी। फिर रात के लिये सब्जी बनाने लगा। आखिर मुनिया को खेलने कूदने का कौन सा मौका मिलता है। आदमी तो बाहर जाते हैं। चार जगह मन की कर लेते हैं। औरतों को तो यही मौके मिलते हैं। देर से घर आयेगी। फिर खाना बनाने की तैयारी करेगी। भले ही मुनिया जितना अच्छा न बना पाऊं पर आज मैं ही खाना बनाकर देखता हूं। वैसे मुनिया सही कहती थी। औरतों का काम भी आसान नहीं होता है। 
   बारिश रुक गयी। फिर एक इंद्रधनुष आकाश में उभरा। आकाश रंगीन हो गया। 
   बच्चों की आवाज आ रही थीं। 
  ” वो देखो। इंद्रधनुष।” 
  रामचंद्र भी देखने लगा। सात रंगों से आसमान भरा था। रामचंद्र को एक और इंद्रधनुष दिखाई देने लगा। उसके विचारों में भी आज एक इंद्रधनुष उदित हुआ है। सात रंगों की झलक बाहर और भीतर दोनों जगह व्याप्त थी। 
   अब रामचंद्र रात के भोजन की तैयारी कर रहा है। लेखक को भी कल्पना करने की आदत है। वह कल्पना कर रहा है कि जब मल्हार से निवृत्त होकर मुनिया घर आयेगी तो घर पर रामचंद्र द्वारा उसका सहयोग देख मुनिया के मन में भी एक इंद्रधनुष खिलेगा। एक साथ तीन इंद्रधनुषों की छटा वातावरण को रंगीन बना देगी। प्रेम और विश्वास के ऐसे इंद्रधनुष जब उदित होते हैं तो फिर जीवन अलग ही रंगीन हो जाता है। फिर कुछ भी असंभव नहीं होता। 
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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