कुछ समय पश्चात शायद लोग इस तथ्य पर विश्वास ही ना करें कि भारत पुण्य भूमि पर एक ऐसा भी महापुरुष पैदा हुआ था, जिसकी विचारधारा, जिसकी सोच, जिसके सिद्धांत, जिसका जीवन-दर्शन हमारी आज की सोच से भी कई गुना ज्यादा विकसित थे।
स्वामी विवेकानंद अत्याधुनिक विचारधारा के धनी महापुरुष थे, उनके विचार, उनकी द्वारा दी जाने वाली शिक्षायें जीवन के यथार्थ धरातल से जुड़ी हुई होती थीं।
स्वामी जी शिक्षा को एक नया आयाम देना चाहते थे, शिक्षा का स्वरूप ऐसा होना चाहिए जो हमें अंदर से मानसिक मजबूती दे, हमारे अंदर एक ऐसे चरित्र का निर्माण करे जिसमें संघर्ष की भावना कभी भी कमजोर न पड़ने पाए।
स्वामी विवेकानंद के जन्मदिवस को आखिर युवा दिवस के रूप में क्यों बनाया है, कभी आपने देखा होगा हर किसी महापुरुष के जन्म दिवस को किसी न किसी रूप में उस व्यक्ति के जीवन से जुड़ी हुई कुछ महत्वपूर्ण चीजों, घटनाओं, उसके विचारों को ध्यान में रखकर मनाया जाता है।
स्वामी विवेकानंद का जन्म दिवस, युवा दिवस के रूप में इसलिए मनाया जाता है क्योंकि उन्होंने भारतीयों की बूढ़ी हो चुकी सोच को पुनः युवावस्था का रूप दिया।
उन्होंने भारतीयों के अंदर एक नवचेतना, आत्मविश्वास और ज्ञान का ऐसा संचार प्रवाहित किया जिसके चलते उस समय के सामाजिक परिवर्तन हुए, कई सामाजिक कुरीतियों का अंत भी हुआ।
उनका हर विचार युवावस्था की तरह ऊर्जावान होता था, ज्ञान के अलौकिक पुंज स्वामी विवेकानंद जी का जन्मदिवस इसलिए युवादिवस के रूप में मनाया जाता है।
मुझे सबसे ज्यादा हैरान ये बात करती कि जब हम किसी भी महान पुरुष के बारे में लिखते हैं, या बोलते हैं तब हम उस महान व्यक्तित्व को उसके धर्म , उसकी जाति के बाँध कर क्यों संकीर्ण कर देते हैं।
जबकि स्वामी विवेकानंद एक ऐसे समाज की कल्पना करते थे जिसमें जाति, धर्म , रंगरूप के आधार पर कोई भेदभाव न हो।
कोई महापुरुष वो राष्ट्रीय धरोहर स्वरूप है, हमें सिर्फ उस महापुरुष के सिद्धांतों, उसके द्वारा किए गए महान कार्यों की बारे में लिखना या बात करनी चाहिए।
स्वामी विवेकानंद वेदांत के प्रचंड विद्वान, महान आचार्य थे। उनका हिंदुत्व को लेकर धर्म-दर्शन अतुलनीय था, उनके द्वारा शिकागो की धर्मसंसद में हिंदुत्व के ऊपर दिया गया व्याख्यान हमेशा हमेशा के लिए अमर हो गया।
अमेरिका से लौटकर उन्होंने देशवासियों का आह्वान करते हुए कहा था-“नया भारत निकल पड़े मोची की दुकान से, भड़भूँजे के भाड़ से, कारखाने से, हाट से, बाजार से; निकल पडे झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से।”
स्वामी विवेकानंद लोगों के मानसिक आलस को खत्म करना चाहता थे, वह चाहते थे कि भारतीय युवा ना सिर्फ शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी सक्रिय बनें,
ज्ञानवान बनें।
स्वामी जी शिक्षा के साथ व्यायाम को भी उतना ही महत्व देते थे, खेल-कूद, शारीरिक प्रतियोगिता में भी उनकी बहुत रुचि थी।
कभी भी हार ना मानने के दृढ़ संकल्प को अपने अन्दर आत्मसात करने पर वो सदैव जोर देते थे।
स्वामी कि का सेवाभाव, शिक्षा-दर्शन, हिदुत्व-दर्शन, उनके सिद्धात, उनके विचार अलौकिक था।
किसी ने सच ही कहा कि विचार कभी मरते नहीं।
रचनाकार – अवनेश कुमार गोस्वामी
