प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता और पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित की जा चुकीं सिंधुताई सपकाल का मंगलवार को 74 वर्ष की आयु में कल दिनाँक 04/01/2022 को देहावसान हो गया। वह पिछले डेढ़ महीने से अस्पताल में भर्ती थीं और दिल का दौरा पड़ने की वजह से मंगलवार को उनकी मौत हो गई। सिंधुताई को महाराष्ट्र की ‘मदर टेरेसा’ कहा जाता है।
उनके सामाजिक कल्याण हेतु कार्यों को स्मृति में संजोए हुए भावभीनी श्रद्धांजलि स्वरूप हम देशवासी श्रद्धा सुमन समर्पित करते हैं -: 🌹🌹🌹🌹🌹🌹

महाराष्ट्र के वर्धा में एक गरीब परिवार में जन्मी सिंधुताई को बेटी होने के कारण लंबे समय तक भेदभाव झेलना पड़ा था। सिंधुताई सपकाल की जिन्दगी एक ऐसे बच्चे के तौर पर शुरू हुई थी, जिसकी किसी को जरूरत नहीं थी। सिंधुताई की मां उनके स्कूल जाने के विरोध में थीं। हालांकि उनके पिता चाहते थे कि वह पढ़ें। लिहाजा जब वह 12 साल की थीं तब उनकी शादी करा दी गई थी। उनका पति उनसे 20 साल बड़ा था।
सिंधुताई सपकाल को पति मिला वो गालियाँ देने और मारने वाला मिला जब वह 9 महीने की गर्भवती थीं तो उसने उन्हें छोड़ दिया। हालात इतने बुरे हो गए कि उन्हें गौशाला में अपनी बच्ची को जन्म देना पड़ा। वो बताती थीं कि उन्होंने अपने हाथ से अपने बच्चे की नाल काटी थी। इन सब बातों ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। उन्होंने आत्महत्या करने की भी बात सोची लेकिन बाद में अपनी बेटी के साथ रेलवे-प्लेटफॉर्म पर भीख मांगकर गुजर-बसर करने लगीं। भीख मांगने के दौरान वो ऐसे कई बच्चों के संपर्क में आईं जिनका कोई नहीं था। उन बच्चों में उन्हें अपना दुख नजर आया और उन्होंने उन सभी को गोद ले लिया। उन्होंने अपने साथ-साथ इन बच्चों के लिए भी भीख मांगना शुरू कर दिया। इसके बाद तो सिलसिला चल निकला। जो भी बच्चा उन्हें अनाथ मिलता वो उसे अपना लेतीं।
सिंधुताई ने अपने जीवन में 1400 से अधिक बच्चों को अपनाया। सिंधुताई का परिवार बहुत बड़ा है। उनके 207 जमाई है, 36 बहुएं हैं और 1000 से अधिक पोते-पोतियां हैं। उनके नाम पर 6 संस्थाएं चलती हैं जो अनाथ बच्चों की मदद करती हैं। उनके इस काम के लिए उन्हें पद्मश्री समेत 500 से अधिक सम्मानों से नवाजा गया।
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि उस दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दे।
समाज को ऐसी पुण्यात्मा को स्मरण करने के साथ साथ उनके जीवन से प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए।
लेखिका –
सुषमा श्रीवास्तव
उत्तराखंड।
