एक प्यारी सी नन्हीं गौरैया,
फुदकती उड़ती अंगराई में…
चूंगती दाने झारियों में,
बच्चे ले रहीं निंद गहराई में…
बच्चे हो या हो परिवार,
दिन भर काम में लगे रहती है…
चाहे हो भोजन लाने की,
या घोंसला बनाने की बारी…
अब सायद ही दिख जाती है गौरैया,
बढ़े पतन की ओर चले…
इसका अस्तित्व बचाना है हम सबको,
कहीं देर हो ना जाये ढ़ले…
हम सबको है इसकी जिम्मेदारी,
जगह-जगह पर दाना-पानी रखें…
आ गई है बसंत-गर्मी की,
ना किसीसे कोई भूल हो सकें…
आओ सब मिलकर कदम बढ़ाते हैं,
इस मुहिम को आगे बढ़ाते हैं…
ना कहीं समय की चूक हो जाये,
आज से ही कदम बढ़ाते हैं…
✍ विकास कुमार लाभ
मधुबनी(बिहार)
