घर-घर के आंगन की,प्यारी चिड़िया गौरैया,
नन्ही-नन्ही सुन्दर,रसोई में भी आये गौरैया।
दिखती नहीं कहीं अब, चली गयी आंगन से,
याद बहुत आती हो,फिरसे आओ आंगन में।
पहले कोई घर ना था,जहाँ लगी ना झोंझ हो,
चारो ओर चहके ये,कमरे दलान में झोंझ हो।
उड़-उड़ के दाना चुगे,घर में खाये रोटी भात,
दाल ढकी न रहे तो,चोंचों से जूठी कर जात।
गौरैया ऐसा पक्षी है,जो बचपन में लेके जाये,
प्रकृति की सुन्दर रचना है,इसे बचाया जाये।
पानी में बैठी ये गौरैया,उछले कूदे एवं नहाये,
ये अठखेली देख के,बच्चा भी खुश हो जाये।
इन्हें बचाएँ जहाँ बची हों,पेड़ों में झोंझ बनायें,
पक्षी घर बना के पेड़ों पे,कहीं-कहीं लटकायें।
दाना पानी उसमें डालें,घर में छत पे भी डालें,
रूठी इन चिड़ियों को,आयें पुनःपुनः से पालें।
शोर मचायें फिर गौरैया,पहले जैसे आंगन में,
फुर्र-फुर्र कर उड़ें अटारी,कभी बैठें आंगन में।
यह है एक सीधी चिड़िया,सब के साथ रहती,
नर मादा दोनों गौरैया,साथ साथ ही हैं रहती।
अंडे देती हैं अपने घोसले में,और उन्हें है सेती,
बच्चे बन निकलें अंडे से,उन्हें संरक्षण में लेती।
विश्व गौरैया दिवस मनाना,चिड़ियाँ है बचाना,
पर्यावरण के अंग हैं ये, इनको है पुनः बढ़ाना।
रचयिता :
डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पीबी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.
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