पहले भाग में हम लोगों ने पढ़ा । गढ़ लुहारों के क़बीले का रहन – सहन पहनना – ओढ़ना । वे लोग काम क्या करते
हैं । कहाँ रहतें हैं ।आदि ।
अब आगें की बातें ………..
वैसे तो इनकी औरतों के रंग ज्यादा गौरे नही होते । अमुमन सांवले ही होते हैं । कोई एक – आध लड़की ही उजले रंग की होती हैं । पर सांवले सलोने रंग में जो गजब की खूबसूरती और कशिश होती हैं ।वो देखने लायक होती हैं ।ज़्यादातर ये लोग अपनी छोरियों के नाम…… चंद्रावल ,फूलमती ,रामकली ,पदमावती, आदि – आदि रखते हैं ।प्यार से उनको चंद्रो ,फुल्लो ,रामो, पदमो ,आदि पुकारते हैं ।जो लड़की ज्यादा खूबसूरत होती हैं उसी का नाम चंद्रो रखा जाता हैं । आप लोगों ने चन्द्रावल मूवी तो देखी ही होगी । अगर नही देखी तो जरूर देखें । देखने लायक मूवी हैं । बिल्कुल रीयल लगती हैं । बताते हैं सच्ची घटना पर आधारित है । इनकी महिलाये अपने शरीर पर जगह – जगह टैटू आदि से नक्कासी करवाती हैं ।शादी में दहेज़ के नाम पर ये लोग अपनी सामर्थ्य के मुताबिक गाय ,बैल ,गाड़ी ,बर्तन, कपड़े आदि अपनी लड़कियों को दान देते हैं । ये लोग नया कंघा तब तक नही खरीदते जब तक पुराना कंघा टूट नही जाता और उसे मिट्टी खोदकर दबा नही देते । फिर नया कंघा लेकर उसे कुलदेवी को चढ़ाकर ही उससे बाल सवारते हैं । इसके पीछे की मान्यता मुझें नही पता । जितना याद है ।उतना ही बताऊंगी । शादी के बाद लड़का – लड़की अपनी अलग गाड़ी में रहते हैं ।इसी लियें गाड़ी दी जाती हैं ।अपने लड़के की शादी के लिये लड़के वाला लड़की के बाप को अपनी हैसियत के हिसाब से चाँदी भेंट करता हैं । ये चाँदी एक किलों से लेकर दस किलों वजन तक हो सकती हैं । शादी में अग्नि फेरों के बाद लड़का – लड़की एक दूसरें को मोर पंख भेंट करते हैं ताकि इनका जीवन इसी तरह सुन्दर और खुशहाल बीते ।शादी की पहली रात चलती गाड़ी में ही बिताई जाती हैं ।पहली संतान का जन्म भी चलती गाड़ी में ही होता है ।जिससे ये लोग होने वाले बच्चे में भी घुमक्कड़ संस्कार डाल सकें ।बच्चे के जन्म के इक्कीस दिन बाद लोहे की गर्म छड़ से बच्चे की पीठ पर एक निशान दागा जाता हैं ।जिससे ये पता लगता है कि ये गढ़ लुहार की औलाद है ।
क़बीले में किसी की मृत्यु होने पर ये लोग ज्यादा विलाप नही करते हैं । इनका मानना है कि इससे मरने वाले की आत्मा भू लोक में ही भटकती रहती हैं । लोग कुत्ते पालने के भी सौकीन होते हैं ।कुत्ता शुभ माना जाता हैं ।जिस भट्टी में ये लोग लोहा तपाकर औजार बनाते हैं उसकी आग ठंडी नही होने देते ।वो चौबीसों घंटे चलती रहती हैं । इनकी मान्यता है कि नई आग जलाने से इनके पूर्वजों की आत्मा इन्हें तंग कर सकती हैं । ये लोग एक जगह पर कभी नहीं ठहरते ।थोड़े – थोड़े दिनों में ही अपना ठिकाना बदलतें रहते हैं ।जब मुसलिम शासक अकबर ने मेवाड़ पर हमला किया था । तभी से ये लोग महाराणा प्रताप सिंह की मदद करने के लिए जंगलों में आकर रहने लगे थे । महाराणा के लिए हथियारों का निर्माण कार्य करते थे । इन्होंने प्रतिज्ञा ली थी कि जब तक अपना राज्य वापस नहीं ले लेंगे तब तक अपने घर नही जायेंगे और ना ही नया घर बनायेंगे ।और तब से ये लोग जंगलो में रहने लगें ।ये लोग गाँव के बाहर या फिर सड़को के किनारें अपना डेरा डालते हैं और वही से गाँव में घूमकर अपने द्वारा बनाये गए लौहे के सामान बेंचते हैं ।
जारी है…
नेहा धामा ” विजेता ” बागपत , उत्तर प्रदेश
