अब जबकि बचपन को पीछे छोड़ जवानी दोनों लड़कियों का स्वागत करने को तैयार खड़ी थीं, सौम्या और दया कुछ ज्यादा ही बचपन को जी रही थीं। शायद समझ रहीं थीं कि बेटियों की नियति ही बिछड़ने की है। दादा बड़ी बहन के लिये रिश्ता तलाश रहे हैं। जल्द सौम्या अपने घर की हो जायेगी। फिर कुछ सालों में दया को भी अपनी ससुराल जाना है। फिर दोनों का मिलन ही कभी कभी हुआ करेगा। अभी बचपन को जितना जी लिया जाये, उतना ही बेहतर होगा। 
   कालीचरण सैरावत के गांव को निकले और इधर दोनों बहनें भेंसों को पानी पिलाने के बहाने पोखर की तरफ निकल लीं। गांव से थोड़ा बाहर यह पोखर दोनों बहनों की अघोषित क्रीडा स्थली थी। 
  भैंस एक बार पोखर में घुसीं तो वहीं आराम करने लगीं। आम के पेड़ पर कच्चे आम आने लगे। जिसे दोनों पत्थर से तोड़ने लगीं। अभी आमों में मिठास नहीं आयी थी। फिर भी दोनों के स्नेह की मिठास के सामने उनका खट्टापन नगण्य था। 
  “तुझे क्या लगता है छोटी।” 
  “किस बारे में।” 
“आज दादा जहाँ गये हैं। वे मेरा रिश्ता स्वीकार करेंगें।” 
    सौम्या अपने मन की बात बस दया को बोलती थी। खुद की शादी की चर्चा करना परिवार में स्वीकार न था। पर दोनों बहनों की आपसी बातों में यह मर्यादा मिट जाती। अभी तक जितने भी रिश्ते कालीचरण जी ने देखे थे, उनके गुण दोषों पर चर्चाओं की गवाह यह पोखर ही बनती थी। हालांकि वे अपने घर अपने मन की बात कहने में भी सक्षम न थीं। 
  “क्यों नहीं। अगर वो बड़े घर के हैं तो मेरी दीदी भी तो कम नहीं। यदि वह बात नहीं करेंगें तो घाटे में ही रहेंगें।” 
  ” अच्छा। सुना है कि लड़का बहुत ज्यादा कमाता है। दादा बोल रहे थे पूरे आठ हजार पगार पाता है। क्या वास्तव में इतनी पगार पाता होगा। या यों ही उड़ा रखा होगा। “
” आठ हजार नहीं तो छह हजार से कम तो नहीं होगी। सरकारी नौकरी है लड़के की। “दया ने अपना गणित लगाया। 
” कमाल है । हमारा तो पूरा घर मजूरी कर महीने के पांच हजार नहीं बना पाता। उधर अकेला लड़का इतनी पगार पाता है। उससे शादी हो जाये फिर तो मौज ही मौज है। “
” बात तो सही है दीदी। वास्तव में मौज है। तभी तो दादा वहां रिश्ता करना चाहते हैं।” 
  “अगर उन्होंने रिश्ता स्वीकार नहीं किया तो। “
  अचानक दोनों गंभीर हो गयीं। यदि रिश्ता स्वीकार नहीं हुआ तो सौम्या के सपने मिट्टी में ही मिल जायेंगें। पूरी बिरादरी में इतना कमाऊ लड़का कहाँ मिलेगा। दया की स्थिति ऐसी थी कि वह सौम्या की खुशी में ही खुश और उसके  दुख में ही दुखी होती थी। 
  पोखर के पास की गीली मिट्टी को जमाकर उन्होंने एक शिवलिंग जैसी आकृति तैयार की। फिर पोखर के जल से ही उनका अभिषेक करने लगीं। विधि महत्वपूर्ण न थी। अपितु महत्वपूर्ण था सच्चा प्रेम, न केवल भोलेनाथ के प्रति अपितु एक दूसरे के प्रति भी। 
   सौम्या का रिश्ता मोहन से तय हो जाये, इसलिये जो दया भगवान भोलेनाथ की आराधना कर रही थी, अभी उसके मानस में खुद के लिये कोई विचार न था। अभी उसकी आराधना में किसी भी तरह का स्वार्थ न था। मोहन उसका भी हो सकता है। आठ हजार महीना कमाने बाला उसका पति भी बन सकता है। पर अभी स्नेह के धागा दृढता से उसके मानस से बंधा था। बड़ी बहन के उज्जवल भविष्य के लिये दया के मानस से उठी प्रार्थना को ईश्वर कितना स्वीकार करेंगें जबकि विधि के विधान से वह भी उस सुख को भोगने की पात्रता रखती है। 
  सौम्या की आराधना निश्चित ही आत्मकेंद्रित थी। वह अपने बेहतर भविष्य की प्रार्थना कर रही थी। केवल खुद के लिये की गयी प्रार्थना अक्सर ईश्वर भी नजरंदाज कर देते हैं। पर दया की प्रार्थना को ईश्वर अनदेखा करेंगें ऐसा कोई कारण तो दिखाई नहीं देता। 
  भैंसें पोखर में डुबकी मार अपनी गर्मी भगा रही थीं। गर्मी के मौसम में भेंसों को पानी से बाहर निकालना बहुत चुनौती का काम था। वह काम दोनों बहनों से किसी तरह किया। फिर दोनों एक दूसरे के हाथों में हाथ डाल कुछ गाते गुनगुनाते घर की तरफ चल दीं। दोनों इस बात से अनजान थीं कि असल चुनौती तो अभी आरंभ होने बाली है। जबकि उन दोनों को एक दूसरे के प्रति असीम प्रेम की मजबूत दीबार को बचा पाना ही बहुत कठिन लगने लगेगा। 
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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