सैरावत के दिमाग पहले से ही आसमान पर थे। रुपये पैसों की कोई कमी नहीं। एक पक्का घर। थोड़ी सी जमीन का भी स्वामित्व, घर में पांच भैंस और दो दुधारू गाय, सैरावत को बाकी बिरादरी से कुछ अलग ही बना रहा था। जबकि बिरादरी के ज्यादातर लोग मजूरी कर अपना जीवन बसर करते, वहीं सैरावत के खेतों पर मजूर काम करते। घर की जरूरत के बाद दूध भी बिकता। पर अब तो कुछ ऐसा हो गया कि वह अपने सामने किसी को न समझता।
  सैरावत के दो लड़कों में बड़ा मोहन बीस का होते होते सहकारी विभाग में नौकर लग गया। पद भले ही चपरासी का हो, जिम्मेदारी भले ही बोझ उठाना हो, फिर भी किसी का मजूर तो न था। कभी कभी बड़े अधिकारियों के घरेलू काम भी करने को मिलते। पर इसमें कौन सी गलत बात है।नौकरी तो सरकार की थी और तनख्वाह भी पूरे आठ हजार, फिर ऊपर का भी कुछ हिसाब किताब था। गरीबों के लिये सरकारी दर पर जो बीज और खाद आती थीं, उनमें अधिकारियों की शह पर कम ज्यादा करने से भी अच्छी आय बन जाती थी। हालांकि मोहन अभी ऊपरी कमाई करने का ज्यादा अभ्यस्त नहीं था। पर उसे ऐसा करने से परहेज भी न था। खुद सामने आती लक्ष्मी का हाथ जोड़ स्वागत करना वह जानता था। धीरे-धीरे अपनी कुशलता बढा रहा था।
  लड़के के रिश्ते के लिये हर रोज कोई न कोई आता पर सैरावत को कोई भी पसंद न आता। आखिर बराबरी भी तो कोई चीज है।
   कालीचरण को मोहन के विषय में पता चला। पहले से प्राप्त विवरणों के आधार पर बात चलाने की हिम्मत न हुई। फिर मन को मजबूत किया। आखिर बात करने में हर्ज ही क्या है। लड़की बाला तो अपनी क्षमता से पूरी कोशिश करता ही है। अगर किसी ईश्वरीय प्रेरणा से यह रिश्ता बन गया फिर तो क्या कहने। लड़की ससुराल में राज करेगी।
   सैरावत के घर में घुसते ही कालीचरण की हिम्मत जबाब देने लगी। कहाॅ उसका छोटा सा घर और कहाॅ यह दसियों कमरों का घर। खुद की क्षमता लगभग नगण्य लगने लगी। पता नहीं आदमी बैठने को भी पूछे या न पूछे। मन हुआ कि यहीं बाहर से वापस चला जाये। फिर वही लड़की बालों की बेशर्मी की तागत। बेटी की भावी खुशी के लिये असंख्य अपमान को झेल लेने की क्षमता। ऊपर से बड़प्पन का आवरण धारण कर वह सैरावत के घर में घुस गया। 
  ” आओ मेहतो आओ। बिराजिये । आपकी ही राह तक रहे थे। राह में तकलीफ तो नहीं हुई।” 
  सैरावत ने खैरियत पूछी तो कालीचरण का विश्वास वापस आ गया। सही बात तो यह थी कि सैरावत को अभी तक अपनी विरादरी में खुद के समान कोई मिला नहीं था। कालीचरण का इतिहास भी उसे विदित था। पर आज कालीचरण गांव का प्रधान था। उससे भी बड़ी बात ठाकुर साहब का विश्वासपात्र था। कालीचरण का भविष्य ज्यादा चटक लग रहा था। भविष्य और वर्तमान को देखते हुए माना जा सकता था कि सैरावत को कालीचरण जैसा समधी मिलना संभव नहीं है। 
  कालीचरण का बहुत अच्छा स्वागत हुआ। आत्मीयता से सारी बातें होती रहीं। दान दहेज की बातों पर भी चर्चा होती रही। सैरावत की मांग कुछ ज्यादा थी जहाँ तक पहुंच पाना अभी कालीचरण के लिये आसान न था। पर जब कालीचरण ही उसकी मांग पूरी नहीं कर सकता तो बिरादरी में कोई और भी नहीं कर सकता। फिर मोलभाव का दौर चलता रहा। आखिर कुछ कालीचरण द्वारा बात ऊपर करने और कुछ सैरावत द्वारा संतोष करने पर बात बनी। पर कहते हैं कि सारा दान दहेज पसंद हो पर लड़की ही पसंद न हो तो क्या अर्थ। आखिर लड़की देखने की तारीख तय हुई। पर सैरावत भी कच्चे खिलाड़ी न थे। कालीचरण से साफ बोल दिया। 
  “मेहतो। हमारी और आपकी रिश्तेदारी तो पक्की। पर लड़के की शादी हम उस लड़की से करेंगें जो हमें ज्यादा पसंद आयेगी। फिर दोनों लड़कियां तरा ऊपर की हैं। शादी तो आपको दोनों की ही करनी है। हमारी मांग कुछ गलत तो नहीं है।” 
  कालीचरण को भी सैरावत की बात में कोई गलती नजर नहीं आयी। आखिर किसी एक लड़की के भाग्य में सुख मिलेगा ही। इस बात से अनजान कि सुख तो बस तकदीर का खेल है। यदि धन की प्रचुरता में ही सुख होता तो बहुत से राजा सब त्याग सन्यासी क्यों बने।वास्तव में सुख तो मन का विषय है। यदि मन में प्रेम है तो गहन वन का वास भी मन को दग्ध नहीं कर पाता। और प्रेम के अभाव में बड़ी अट्टालिकाओं में रहने के बाद भी मनुष्य अपने आंसुओं को छिपाता रहता है। 
  मोहन से सौम्या की शादी होगी अथवा दया की, इससे बहुत आगे विचार का विंदु है कि इसका दोनों बहनों के आपसी संबंधों पर क्या प्रभाव होगा। क्या दो शरीर एक प्राण का पर्याय रही दो बहनें बाद में भी अपने मन में किसी क्षुद्र विचारों को  स्थान नहीं देंगीं। बुराई को जीतना कब आसान होता है। फिर जब खुद का स्वार्थ सामने हो तब कौन किसी अन्य की चिंता करता है ।पहले खुद का पेट भरता है फिर किसी दूसरे को खिलाता है ।खुद भूखा रहकर किसी अन्य को भरपेट भोजन कराना, यह तो उन्हीं महानमना लोगों का चरित्र है जो कि इस संसार में कभी कभी ही जन्म लेते हैं। सामान्य लोगों का मन तो इस विषय में बहुत कमजोर होता है। फिर विकार बढने का कोई साधन मिल जाये तो मन की कुभावना उसी तरह अपना विस्तार करती हैं जैसे कि घृत डालने पर अग्नि। 
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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