आखिर ठाकुर साहब के सहयोग से कालीचरण गांव के प्रधान बन गये। उनकी बिरादरी के लिये यह एक बड़ी बात थी। जीवन भर मजदूरी और दूसरों की सेवा कर परिवार का पेट भरते आये लोगों के लिये उनकी बिरादरी के किसी आदमी का प्रधान बनना बहुत बड़ी बात थी। उससे भी बड़ी बात थी कि कालीचरण ठाकुर साहब का भरोसेमंद आदमी है। अपनी जाति के लोगों पर भरोसा करने के बजाय ठाकुर साहब ने कालीचरण पर भरोसा किया।
बातें एक की चार हो जाती हैं। चाहे वो अच्छी हों या बुरी। घटनाओं के मर्म तक बहुत कम की नजर पड़ती है। यदि किसी की पड़ती भी है तो बहुसंख्यक विचारधारा के समक्ष उस नजर का कोई मोल नहीं होता। अक्सर देखकर भी अनदेखा करना होता है।
प्रधानी की जिम्मेदारी के विषय में कालीचरण बस इतना जानता था कि उसे बस ठाकुर साहब के हुक्म पर अमल करते रहना है। अक्सर ठाकुर साहब द्वारा भेजे कागजों पर और बैंक चैकों पर वह अपना अंगूठा लगा देता था। गांव में कुछ काम भी हुआ। पर उस काम को कराने का मूल्य वास्तविक मूल्य से बहुत ज्यादा होता था। बहुत सारे काम तो बस कागजों में कालीचरण के अंगूठे से ही हो जाते। यथार्थ का ज्ञान बहुत कम को था। कालीचरण को तो बिलकुल भी नहीं। कंधे कालीचरण के थे पर बंदूक ठाकुर साहब के हाथ में थी।
सौम्या ने पढाई बंद कर दी। पर माॅ के दबाव में दया की पढाई जारी रही। वैसे भी किसी को जबरदस्ती स्कूल भेजा जा सकता है, पढाई नहीं करायी जा सकती। शिक्षा के महत्व को सही तरह से समझा पाना आसान नहीं था। खुद निरक्षर सुरैया शिक्षा का महत्व समझती थी पर अपनी बेटी को समझा नहीं पाती। अक्सर तर्क पर कुतर्क हावी होते रहे। फिर भी एक अशिक्षित महिला अपनी पूरी शक्ति से वह कर रही थी जिसपर गर्व किया जा सकता है।
कालीचरण को सौम्या के विवाह की चिंता थी पर अब वह प्रधान था। कुछ पैसे भी उसने जोड़ लिये थे। ऐसे ही कहीं विवाह कर देना संभव न था। समय पर समय गुजरता गया। कहीं लड़के का परिवार कालीचरण को न जचा तो कहीं लड़के बालों ने रुचि नहीं दिखाई। मनुष्य की इच्छा से कब क्या होता है। पंद्रह होते ही लड़की के हाथ पीले कर देने की मानसिकता बाले कालीचरण अभी तक सौम्या का विवाह नहीं कर पाये जबकि सौम्या ने सत्रह बसंत न देख लिये।
दूसरी तरफ शिक्षा की तरफ दया की बेरुखी से आखिर सुरैया ने भी हार मान ली। भले ही सरकारी शिक्षा निःशुल्क है। मध्याह्न भोजन भी निःशुल्क है। पर किसी को जबरदस्ती पाठशाला भेजना ही शिक्षा नहीं है। शिक्षा के प्रति बेरुखी पूरे परिवार में थी। सुरैया अकेले सभी से लड़ सकती थी यदि उसे दया का थोड़ा सा भी साथ मिल जाता। साथ मिलना तो दूर, इस जबरदस्ती ने दया के मन में सुरैया के प्रति प्रेम भी बहुत कम दिया था। आखिर सुरैया ने अपने हथियार डाल दिये। दया को लगा कि मानों अब उसे आजादी मिल गयी।
दया बहुत अधिक शिक्षित तो नहीं हो पायी पर सच्ची बात यह है कि कोई भी अच्छा कार्य कुछ तो अच्छा प्रभाव छोड़ता ही है। दया का रहन सहन सौम्या की तुलना में अधिक बेहतर बन गया। पहनने औढने का सलीका उसमें अधिक बेहतर था। सजने संवरने में भी दया सौम्या से इक्कीस थी। पर घर के कामों में वह सौम्या की बराबरी नहीं कर सकती थी। दोनों में अब पर्याप्त अंतर था। फिर भी यह अंतर उनके मध्य दीवार नहीं था। दोनों अभी तक एक दूसरे से बहुत प्रेम करती थीं। एक दूसरे पर जान छिड़कती थीं। जैसे कि दोनों के भीतर एक ही आत्मा हो जो दो अलग अलग शरीरों में दो अलग अलग तरीके से जी रही हो।
मंद मंद चलती हवा सभी के मन को आनंदित करती है। पर जब वायु का वेग बढने लगता है तो मन एक तूफान के आगमन की चिंता में विह्वल हो जाता है। तूफान के सामने कुछ भी नहीं टिकता। कभी कभी तो सरकारी व्यवस्था भी तूफान का सामना नहीं कर पातीं।
कभी कभी मनुष्य खुद व खुद ऐसे तूफान की पृष्ठभूमि तैयार कर देता है जिसके आगमन पर न केवल संबंधों की मर्यादा तार तार हो जाती है, अपितु आपसी प्रेम भी टुकड़े टुकड़े हो जाता है। ईर्ष्या और द्वेष का भंवर बुद्धि और विवेक को ही मिटा देता है। फिर बार बार प्रश्न उठता है कि गलती किसकी। बहुत सारे उत्तरों पर अपना समाधान तलाशता रहा प्रश्न आखिर तक अपने प्रश्नों का सही उत्तर न मिल पाने के दुख में दुखी ही बना रहता है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
