कालीचरण वहीं जमीन पर ठाकुर साहब से दूरी पर बैठ गया। वैसे ठाकुर साहब ने आज उसे कुछ सम्मान दिया था पर उसके बाद उन्हें कालीचरण को जमीन के स्थान पर अपने पास कुर्सी पर बिठाना उचित नहीं लगा। सम्मान भी उस रोटी की तरह ही होता है जिसे किसी भूखे को थोड़ा थोड़ा ही दिया जाता है। यदि इकट्ठा सम्मान मिल जाये तो बहुत संभव है कि जीवन भर अपने सम्मान को तलाशता रहा व्यक्ति उस सम्मान को सम्हाल न पाये। जैसे बहुत दिनों का भूखा भरपेट रोटी खाकर अपच का रोगी हो जाता है, उसी तरह जीवन भर सम्मान का भूखा रहा व्यक्ति अतिरेक सम्मान को पाकर अपनी हैसियत भूल जाता है।
  “हुकुम कीजिये मालिक। यदि मेरे वश की बात हुई तो जरूर करूंगा। यदि सामर्थ्य से बाहर की बात रही, उस समय भी मालिक का हुकुम अपनी आखरी सांस तक मानता रहूंगा। आखिर आप ही तो हमारे माई बाप हैं। आपकी छत्रछाया में ही तो हम पले बढे हैं।”
  अभी कालीचरण जानता न था कि वह ठाकुर साहब के किस काम में उनका सहयोगी बन सकता है। मियां की दौड़ मस्जिद तक। जीवन भर मजूरी करते आये कालीचरण के दिमाग के घोड़े उस थाह को समझ पाने में पूरी तरह असफल थे। बहुत से बहुत मालिक कोई बड़ी मजदूरी का काम बतायेंगे। बहुत संभव है कि उसकी मजूरी भी न मिले। फिर भी वह मालिक का कहा मानेगा। अब तो घर में कई कमाने बाले हैं। मालिक की बात तो उन दिनों भी नहीं टाली थी जब वह अकेला परिवार का पेट भरा करता था।
  ठाकुर साहब मन ही मन वह भूमिका तैयार कर रहे थे जो उनके लक्ष्य सिद्धि के लिये आवश्यक थी। कुछ देर शांत रहकर फिर बोलने लगे।
” कालीचरण। तुम्हें क्या लगता है। इस संसार में सबसे दुर्लभ क्या है। वह क्या है जिसे मेरे जैसा सामर्थ्यवान चाहकर भी नहीं खरीद सकता है।”
  “मालिक। ये सब बड़ी बातें। भला मुझे क्या मालूम। मुझे तो लगता है कि इस दुनिया का कोई भी सुख ऐसा नहीं जो मालिक को हासिल न हो। ऐसा कुछ भी नहीं जो मालिक के पास मौजूद न हो। ऐसी कोई चीज ही नहीं जिसे मालिक खरीद न सकें। असहायता तो निर्धनों की निशानी है। मालिक के लिये क्या असंभव। “
” नहीं कालीचरण। सच्चाई इससे बिलकुल अलग है। सच्चाई तो यह है कि हमारे पास कितने भी साधन हों पर सुख और आराम जैसी किसी भी चीज को हम नहीं जानते। जैसे सागर के तट पर बैठा मनुष्य अपार जलराशि के बाद भी अपनी प्यास नहीं बुझा पाता, उसी तरह विभिन्न सुखों की जननी मानी जाती यह संपदा किसी को सुख नहीं देती। वास्तव में दुख ही दुख देती है। सही बात है कि इन संपत्ति के ढेर पर बैठा मनुष्य खुलकर सांस भी नहीं ले पाता। मन तो करता है कि सब छोड़ कर सन्यास ले लूं। पर वह भी नहीं हो पाता। कारण मन की कमजोरी। “
   ठाकुर साहब कुछ देर शांत रहे। कालीचरण को अब कोई उत्तर न सूझा। बड़े लोग भी बहुत दुखी होते हैं। इसका उसे पहली बार अनुभव हुआ।
” कालीचरण। सही बात तो यह है कि आज तक मैं अपनी संपत्ति से किसी विश्वासपात्र को खरीद नहीं पाया हूँ। बाप दादाओं से संपत्ति मुझे मिली। आज हमारे ही परिवारजन हमसे नाराज हैं। हमारी उनकी मुलाकात अदालत में ही होती है। कितनों पर भरोसा किया। पर वह सारे विश्वास बालू के बने घरों की भांति कब के ढह गये। आज मेरे पास पूरे क्षेत्र की जिम्मेदारी है पर वह गांव जिसमें मैंने जन्म लिया, आज मुझे पुकारता है। इस गांव की सेवा करना चाहता हूँ पर कर नहीं पाता।
  कालीचरण। तुम्हें तो याद ही होगा कि गांव के वर्तमान प्रधान को प्रधान बनाने के पीछे किसका हाथ है। सोचा था कि इस तरह गांव की सेवा होती रहेगी। पर प्रधान जी एक बार पद मिलते ही अपनी सारी जिम्मेदारी भूल गये।पूछने पर कुछ बताते भी नहीं हैं। गांव आज भी असहाय है। बताओ। क्या यह धोखा नहीं है।
   हाॅ। यह सचमुच धोखा ही तो है। गलती मेरी ही थी कि मैं विश्वासपात्र को पहचान न सका। खुद जाति पाति के भंवर से अपने मानस को आजाद न कर सका। पर अब नहीं। इस बार प्रधानी का चुनाव तुम लड़ोंगें। अब यह गांव अव्यवस्था की भेंट नहीं चढेगा। “
  छोटे मकानों में रहते आये को बहुमंजिला इमारत देखकर ही चक्कर आने लगते हैं। वही स्थिति कालीचरण की थी। मालिक के विश्वास पर वह किस तरह खरा उतरेगा, उसे खुद विश्वास न था। वह एक मजदूर जिसने जीवन भर गुलामी ही की, भला इतना बड़ा दायित्व किस तरह उठा पायेगा। मालिक के आदेश को सर झुकाकर स्वीकार करता रहा कालीचरण अचानक दोनों हाथ जोड़ बैठ गया। मानों मालिक के आदेश के पालन में खुद की दुर्बलता स्वीकार कर रहा हो। 
  ” नहीं कालीचरण। मेरा निश्चय अटल है। प्रधानी का चुनाव भी तुम्हीं लड़ोंगें और प्रधान भी तुम्हीं बनोंगें। सहयोग के लिये मैं तो हूँ ही। आखिर गांव के विकास का प्रश्न है। और इसके लिये तुमसे अधिक बेहतर कोई भी नहीं।” 
  मालिक के विश्वास पर कालीचरण का आत्ममुग्धता की स्थिति तक पहुंचना लाजमी ही है। बेचारे की बुद्धि मालिक की इस उदारता के कारण का स्पर्श कर पाने में भी असमर्थ थी। 
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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