आसमान में काले बादल छा गये। तेजी से आवाज हुई। लगा कि जैसे बिजली गिरी हो। हवाओं की रफ्तार बढने लगी। तेज तूफान के साथ मूसलाधार बारिश की संभावना थी । वैसे तूफान की घोषणा मौसम विभाग ने पहले से कर रखी थी। पर इन बातों से फैक्ट्री तो बंद नहीं हो जाती। रात की शिफ्ट में जुगनू की ड्यूटी लगी थी। घर से निकलने से पहले एक बार फिर से उसने अपने सुपरवाइजर को फोन किया। मन की आशा बड़ी बलबती होती है। आखरी क्षणों तक हर संभव मार्ग तलाशती है।
सुपरवाइजर कोई मालिक तो था नहीं। वह पहले से ही जला भुना बैठा था। आज खराब मौसम में भी मालिक ने छुट्टी न की। अक्सर मनुष्य अपने मन का गुस्सा किसी न किसी पर तो निकालता ही है। मालिक पर वश न था। पर जब जुगनू का फोन पहुंचा, वह जुगनू पर खुलकर बरस पड़ा।
” मौसम खराब है तो क्या फैक्ट्री बंद हो गयी। इस तरह तो हर रोज कोई न कोई बात बनी रहेगी। खराब मौसम को देख जल्द निकलना चाहिये।”
जुगनू घर से चला तो एक बार उसने दया की तरफ देखा। दया को शहर आये लगभग छह महीने हुए थे, वह शहर के सारे तौर तरीके सीख गयी। हालांकि घर में उसका जेठ मोहन भी रहता था पर उसे कोई परेशानी नहीं हुई। हल्के पीले रंग के सूट में दया बहुत ज्यादा खूबसूरत लग रही थी।
खाने का डिब्बा जल्द अपने झोले में रख, अपनी साइकिल उठा जुगनू निकल गया। मौसम और ज्यादा खराब हो, उससे पहले उसे फैक्ट्री तक पहुंचना था।
मोहन ने दया को छूट दी तो दया भी मोहन से ज्यादा संकोच नहीं करती थी। उससे खुलकर बात करती। पर्दा की अवधारणा तो उसके मायके में भी न थी। पर शहर में सर पर पल्लू रखने की बाध्यता भी न रही। जब सभी को एक ही कमरे में गुजारा करना है तब कुछ न कुछ बदलाव सभी करते हैं।
दया ने मोहन को खाना खिलाया। फिर खुद खाना खाकर रसोई साफ की। कमरे में वह लेट गयी। पर आज उसे नींद नहीं आ रही थी। पता नहीं क्यों उसे लग रहा था कि तूफान ज्यादा विकराल रूप रखने बाला है। जुगनू की चिंता हो रही थी। यही स्त्रियों का स्वभाव होता है। अद्भुत बात थी कि कभी मोहन के लिये वह अपनी बहन सौम्या से द्वेष करने लगी थी। पर आज उसके लिये उन पुरानी बातों का कोई मूल्य न था। पुराने को बहुत पीछे छोड़ वह अपने मन में पूरी तरह जुगनू को बसा चुकी थी।
जहाँ दया विगत बातों को भूल जीवन की राह पकड़ चुकी थी, वहीं मोहन का मन आज भी उन्हीं बातों पर डांवाडोल होता था। मन ही मन वह दया के लिये आहें भरता। काश यह बहुमूल्य रत्न उसके भाग्य में होता। उसे तो यह रत्न मिल नहीं पाया। और मिला किसे। उसी के छोटे भाई जुगनू को। अक्सर रात में बरामदे में शयन करते करते भी वह दया के सपने देखा करता। सपनों में ही सही पर दया से इश्क लड़ाता।
जब जुगनू की ड्यूटी दिन की होती और रात वह दया के साथ सो रहा होता, उस रात तो मोहन ज्यादा ही बैचैन होने लगता। जिस पुष्प की सुगंध की लालसा उसके मन से न निकलती, उसी पुष्प को छोटे भाई द्वारा सूंघने की कल्पना मात्र ही बैचैन कर देती। फिर कभी कभी तो पूरी रात बिस्तर पर करबट बदलते निकल जाती।
रात लगभग आधी होने को आ गयी। बारिश तेज हो गयी। तेज हवा की बोछारों ने लगभग पूरा बरामदा गीला कर दिया। मोहन बहुत थोड़ी सी जगह में सिमटने की कोशिश कर रहा था।
“जीजाजी। भीतर कमरे में आ जाइये। आप तो बिल्कुल ही भीग गये।”
दया की मानवता कि उसने भीगते हुए अपने जेठ को कमरे में जगह दी। मोहन का राक्षस कि उसे यह दया का खुला आमंत्रण लगा। आग दोनों ही तरफ लगी हुई है। नहीं तो दया को उसकी चिंता क्यों। जब मन में कुभाव ही फल फूल रहे हों तब वह कलुषित मन किसी की सज्जनता की कद्र नहीं करता है।
बारिश और तेज हो गयी। बादलों की गर्जना भी बढ गयी। उस तेज आवाज में दया की आवाजें दबने लगीं।
“छोड़ो जीजाजी। मैं तो आपकी बहू हूँ। आपके छोटे भाई की पत्नी। यह अनुचित है। अधर्म है। पाप है।”
“क्या अधर्म है। एक युवक की मर्जी जाने बिना उसका विवाह तय कर दिया गया, क्या यह अधर्म नहीं। जिसके जीवन का फैसला लेना था, उसी को फैसले से अलग करना क्या अधर्म नहीं है। इतने सालों में मेरे मन में जिस कारण से पीर हो रहे है, क्या वह अधर्म नहीं। फिर कुछ भी अधर्म नहीं। “
” जीजाजी ।वह तो पुरानी बात हो गयी। मनुष्य हमेशा संबधों में बंधा होता है। उन संबंधों की मर्यादा में खुद को बांधता है। पशुओं से खुद को प्रथक करता है। “
” यह झूठ है। बंधन में बंधकर भी मन कब बंधता है। यदि यही सत्य होता तो मेरे मन में सौम्या के लिये प्रेम क्यों नहीं। और ऐसा कौन सा पल कि तुम्हारी याद न आयी। “
दया मोहन के बलिष्ठ हाथों में जकड़ी कराहती रही। कोशिश करके भी खुद को उस राक्षस के चंगुल से मुक्त न कर पायी। राक्षस रिश्ते की मर्यादा को तार तार करता गया। फिर राक्षस सो गया। पर अब दया को नींद कहाँ। सौम्या की बात सच निकली। वास्तव में खुद मन से पवित्र होने पर भी खुद को कलंकिनी अनुभव करने लगी। वैसे भी दोष तो स्त्री का ही होता है। पुरुष को दोषी कौन मानता है। फिर जब बात परिवार की हो, उस समय तो कभी नहीं।
बाहर बारिश और तेज होने लगी। पर उस बारिश से तो तेज नहीं जो दया की आंखों से बरस रही थी।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
