मौसम में हल्की ठंडक आ गयी। देवों के जगने का समय आ गया। कालीचरण और सैरावत दोनों के घर ही रिश्तेदारों का जमावड़ा था। देवोत्थान के दिन ही मोहन और सौम्या की शादी होनी थी। इतने समय में दया बहुत कुछ भूल चुकी थी। सब तकदीर का खेल है। वैसे भी किसी संपन्न से विवाह किस तरह अच्छी तकदीर कही जा सकती है। माता सीता भी तो चक्रवर्ती सम्राट के ज्येष्ठ पुत्र  से ब्याही थीं। उन्हें जीवन में कब सुख मिला। चौदह वर्ष पति के साथ वनों में भटकीं। बाद में भी अवध की प्रजा की इच्छा से महर्षि बाल्मीकि के आश्रम में रहीं। जब खुद भगवान तकदीर से न बच पाये तो आम इंसानों की क्या गिनती। कई बार तो जब मन का न हो पाने का कारण ईश्वर द्वारा उससे भी बेहतर तैयार रखना होता है।
  वास्तव में मनुष्य बहुत तरीकों से संतोष कर लेता है। पर आस पास के लोगों को संतोष नहीं होता। किसी की दुखती पर सभी बार बार हाथ रखकर देखना चाहते हैं कि वास्तव में उसे कितना दर्द हो रहा है। किसी के दर्द में तड़पता देख अपने मन में अजीब सी शांति अनुभव करते हैं।
   कालीचरण का घर रिश्तेदारों से भरा हुआ था। ऐसे में कितनी ही रिश्तेदार स्त्रियां बातों ही बातों में उस बात को उठा देतीं कि किस तरह दोनों बहनों की परीक्षा में सौम्या ने बाजी मारी। ऐसी बातों का अर्थ कुछ न था। सौम्या का विवाह होने ही जा रहा था। फिर भी कुछ को  दया से अकारण सहानुभूति हो रही थी। सहानुभूति के माध्यम से वैर के बीज बोये जा रहे थे।
  ” सब भाग्य का खेल है, बिटिया। जोड़ियां तो भगवान के घर ही बनती हैं। तुम्हारे लिये भगवान ने जिसे बनाया है, एक न एक दिन वह सामने आ ही जायेगा। सभी को अपने हिस्से का सुख दुख झेलना होता है। फिर सुख और दुख क्या हैं। सब मन का बहम ही तो हैं।”
  वैसे दया खुद इसी तरह की बातों को सोच निराशा के भंवर से बाहर आयी थी। पर आज जब एक बुजुर्ग महिला उसे निराशा से बाहर ला रही थी तो दया को लग रहा था कि वह अब वास्तव में डूब रही है। जल में डूबता मनुष्य जब खुद हाथ पैर चला बचने का प्रयास करता है तब अक्सर अपार जलराशि से भी बाहर आ जाता है। पर किसी अन्य द्वारा बाहर निकालने के प्रयास में बहुधा उस जल में ही डूब जाता है। बाहर निकालने की कोशिश करने बाले के प्रयासों की सराहना होती है। बहुत कम लोग समझ पाते हैं कि कब बाहर निकालते निकालते चुपचाप धक्का दे दिया गया था।
  दया संतुष्ट थी। पर अब नहीं। आज विवाह गीत उसे विषाद गीत प्रतीत हो रहे थे। खुद को जितना समझाती, उतना ही अधीर होती जाती। बंधन से निकलने के प्रयास में उस बंधन में और बंधती जाती।
  दूसरी तरफ मोहन ने न तो सौम्या को देखा था और न दया को। उसे अपने बुजुर्गों के निर्णय पर पूर्ण विश्वास था। पर अब उसका मन भी कुछ विकल था। कारण वही रिश्तेदारों की महिमा। मजेदार बात यह थी कि मोहन को दया की उत्कृष्टता समझाने बाले कुछ रिश्तेदार वही थे जिनकी औरतों ने सौम्या को दया पर बरीयता दी थी। मोहन समझ नहीं पा रहा कि ये वास्तव में किस तरह शुभचिंतक हैं। यदि उस समय कुछ गलत हो रहा था तब ये चुप क्यों रहे। क्या इनकी बात का कोई मोल नहीं। क्या इन्हें केवल भीड़ बढाने के लिये लेकर गये थे। जब इनकी स्त्रियों ने माॅ पर दबाव बनाया था, उस समय भी ये चुपचाप देखते रहे। 
  विवाह से पूर्व जबकि कोई लड़का अपनी भावी जीवन संगिनी की याद में रात में सो भी नहीं पाता, मोहन बुजुर्गों के निर्णय पर अफसोस कर रहा था। खुद को ठगा सा महसूस कर रहा था। बिना परखे सौम्या के गुणों की अवहेलना कर रहा था। हालांकि अभी तक विवाह नहीं हुआ था। वह अपने मन की बात माता पिता को बोल सकता था। फिर भी मात्रपित्र भक्ति का चोला उतारने में असमर्थ था। 
  विवाह का शुभ दिन आ गया। सैरावत के घर से बारात चल दी। दूल्हे ने सबसे पहले ग्राम देवी का आशीर्वाद लिया। फिर बारात ने अपनी मंजिल के लिये प्रस्थान किया। आखरी क्षणों तक मोहन का मन अफसोस के ऐसे भंवर में डूब चुका था जहाँ किसी की अच्छाई का कोई मूल्य नहीं होता। जहाँ किसी के गुण भी दोष ही प्रतीत होते हैं। जहाँ किसी कन्या से विवाह उसे जीवन पथ पर साथ लेकर चलना नहीं अपितु उसपर एक अहसान करना होता है। 
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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