सौम्या और दया दोनों को ही उनकी माताओं ने उपलब्ध श्रंगार साधनों से बखूबी तैयार किया था। जहाँ सौम्या ने चटक लाल रंग के कपड़े पहने थे, वहीं दया ने हल्के पीत वर्ण की साड़ी पहनी थी। सौम्या का श्रंगार कुछ अति जैसा लग रहा था, वहीं दया के श्रंगार में वास्तविकता अधिक थी। वैसे भी दया का रंग सौम्या की अपेक्षा अधिक साफ था। उस साफ रंग पर हलका श्रंगार भी अधिक खिल रहा था।
   किसी का रंग तो ईश्वर प्रदत्त होता है। रंग के साथ साथ व्यवहार भी अलग प्रभाव छोड़ता है। बुजुर्ग महिलाओं को देख जहाँ सौम्या अपना कर्तव्य समझ नहीं पायी, वहीं दया ने सभी के पैर छूने शुरू कर दिये। विंदु को एक ही नजर में दया भा गयी। जब दया विंदु के पैरों की तरफ झुकी, उसी समय विंदु ने बड़े प्रेम से उसे बिलकुल अपने पास बिठा लिया। दया के मुख मंडल पर एक अलग मुस्कान थी। विंदु ने इसे दया का हंसमुख स्वभाव समझा। हालांकि वह मुस्कान उसके प्रथम विजय का प्रतीक थी। जिसे वह प्रयास कर भी न रोक पायी।
  सौम्या को पिछड़ते देख निम्मो आगे बढी। उसके समझाने पर फिर सौम्या ने भी सभी के पैर छुए। हालांकि पहली भूल उसके मानस की पीड़ा को ही नहीं बढा रही थी, अपितु उसके चेहरे पर भी प्रतिलक्षित हो रही थी।
   वैसे तो ज्यादातर महिलाओं को दया ज्यादा पसंद आ रही थी। पर केवल पसंद ही उनकी चयन का आधार नहीं हो सकता था। सैरावत की बहन सुहासिनी तो दया को देख एक गहरे दुख के भंवर में पड़ गयी। उसकी पुत्रवधू उसे पूछती न थी। अपने मन की व्यथा वह मन में ही छिपाती रहती। दुख की बात है कि उसे कुसंस्कारी पुत्रवधू मिली। पर उससे भी अधिक दुख की बात है कि विंदु के भाग्य में दया जैसी सुंदर और संस्कारी पुत्रवधू का सुख लिखा है।
   सुहासिनी खुद का दुख कम नहीं कर सकती थी।पर खुद का दुख बढते भी नहीं देख सकती। विंदु की आंखों में दया के लिये उमड़ते स्नेह को देख वह शांत नहीं बैठ सकती। सचमुच उसके आगमन का एक उद्देश्य है। उसे दया को विंदु की पुत्रवधू बनने से रोकना है।
  महिलाओं ने धीरे-धीरे दोनों की परीक्षा लेना आरंभ किया। संगीतप्रिय महिलाओं ने उनसे गाना गंवाया, ढोलक बजबायी और नचबा कर भी देखा। फिर घर के काम काज की बारी आयी। झाड़ू, पोंछा, भैंस को चारा देना, उसका दूध काढना, भैंस के गोबर से उपले बनबाना, दही को मथकर मक्खन निकलवाना, मक्खन का घी बनबाना, खाना बनबाना और भी कितनी तरह से परीक्षा ली गयीं। घर के कामों में सौम्या की फुर्ती देखने योग्य थी। हालांकि दया भी बहुत ज्यादा पीछे नहीं थी। माना जा सकता था कि वह भी घर की जिम्मेदारी अच्छी तरह निभा सकती है। वह भी समय के साथ चल सकती है। विंदु को अभी तक दया में कोई कमी नहीं लगी। पर परिणाम बताते समय सुहासिनी पूरी तरह सौम्या के पक्ष में रही। सही बात है कि अगर बहू घर का काम ही नहीं कर पायेगी तो उसके रूप का ही क्या अर्थ। खुद की तारीफ सुन सौम्या की आंखों में भी चमक आ गयी।
  ” पर जीजी। दया भी घर का काम कर लेती है। अभ्यास से वह भी सीख जायेगी। मैं भी जब व्याह के आयी थी तब कितना काम कर पाती थी।”
   विंदु का प्रतिउत्तर सुहासिनी को बुरा लगा।
  ” विंदु। यह जो मेरे बाल हैं, वे धूप में सफेद नहीं हुए हैं। पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं। अपना उदाहरण मत दो। तुम्हारे समधाने में मैं बताने लगूं कि तुम अभी तक कितना काम सीख चुकी हो, अच्छा नहीं लगेगा।”
   विंदु की भौंहें तन गयीं। फिर भी वह रिश्ते की मर्यादा के कारण चुप रही।
” मैं तो भाई का भला चाहती हूँ। फिर तुम्हारी मर्जी। नहीं तो सभी से पूछ लो। “
विंदु के साथ साथ दया के मन में भी नवीन आशा का बीज अंकुरित होने लगा। विंदु इस समय अपना सहयोग चाहती थी। अपने समर्थन के लिये वह अपनी भाभियों का मुंह देख रही थी। इस बात से अनजान कि जिस तरह वह अपनी ननद से खपा रहती है, उसकी भाभियों के मन में भी वही बात है। जिस तरह वह अपने पति को ननद के लिये खर्च करने से रोकती है, उसी तरह उसकी भाभियों को भी लगता है कि उनके पति अपनी बहन के लिये बेबजह खर्च करते हैं।
  ” जीजी। मुझे तो बड़ी जीजी की बात सही लग रही है। फिर रूप रंग तो बस चार दिनों का ही होता है।”
  ” और किसी और से पूछ लो। मैं भी गलत और तुम्हारी भाभियां भी गलत।सब गलत नहीं हो सकते।” 
  खुद की भाभियों को ननद के पक्ष में जाते देख विंदु की हिम्मत आगे बात बढाने की नहीं हुई। 
   ” ठीक है जीजी। अगर आप सभी की यही इच्छा है तो सौम्या ही मेरी बहू बनेगी।”
  सही कहा है कि युद्ध और खेल में कभी भी बाजी पलट सकती है। कुछ समय पूर्व तक जो दया अपनी जीत के लिये आश्वस्त थी, वह कोशिश कर अपने आंसुओं को रोक रही थी। कुछ समय पूर्व तक जो सौम्या अपनी हार मान चुकी थी, अपनी खुशी को छिपा भी नहीं पा रही थी। सही बात तो यह है कि एक मुकाबला उन प्रार्थनाओं के मध्य भी हुआ था जो कि दोनों बहनें भगवान भोलेनाथ से कर रहीं थीं। सुहासिनी तथा अन्य रिश्तेदार महिलाएं तो मात्र एक बहाना थीं, सत्य तो यही था कि उस दिन पोखर के किनारे की गयी दया की निश्छल प्रार्थना ही भोलेनाथ ने स्वीकार की।
   सौम्या को मध्य में बिठा उसकी गोद में कपड़े, कुछ गहने, फल और मिठाइयाँ रखी गयीं। फिर से गाने बजाने का दौर शुरू हुआ। फिर भोजन शुरू हुआ। अंत में विदा की तैयारी होने लगीं।
  विदा से ठीक पूर्व एक बार विंदु दया के पास पहुंची। दोनों एक दूसरे को देखती रहीं। बिना बोले एक दूसरे की आंखों में देखती रहीं। अचानक विंदु ने दया को अपने गले से लगा लिया। रोकते रोकते भी दया की आंखों से आंसू गिरने लगे जिसे विंदु ने अपनी साड़ी के पल्लू से पोंछ दिया। दोनों खुद को एक अज्ञात बंधन में बंधा महसूस कर रही थीं। संभव है कि यह जीवन के नाटक के आगे के अंकों की कोई भूमिका तैयार हो रही हो। 
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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