खिलखिलाती मुस्कुराती सुबह,
नर्म फूलों की पंखुड़ियों पर ,
बनके सफक इठलाती सुबह।
कोई  अंधेरा हमारे हौसले से बड़ा नही होता,
सूरज की जगमगाती किरणों के साथ,
यह बताती सुबह।
देर तक वो अलसाए लेटे रहना ,
वो वेफ़िक्री का चढ़ता सूरज ,
वो बीते दिनों के झरोखों से याद आती सुबह।
वो मन्दिर के वेदों के स्वर,
वो आरती की लौ में दिखता ईश्वर,
जमाने भर के सुकुनो का भाव लाती सुबह।
  कितना उत्साह से भर देती है,
मन के कोने कोने को तृप्त करती है,
वो झरोखों से स्वर्णिम आती सुबह।
अन्जू दीक्षित,
बदायूँ
उत्तर प्रदेश।
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