इंसान की जिंदगी है एक बहीखाता,
सुख-दुख जिंदगी में समाहित
है गुणा भाग हमारे कर्मों के
खाते हैं भर पड़े यादों के..
ख्वाबों को अपने भूलकर है बैठे ,
अपनों के लिए सदा मुस्कुराते रहे
जिंदगी के कर्मों का कर्ज हम चुकाते रहे ..
शीतल छाया से दूर, सुलगती धूप में
घर का खाता चलाने पैदल हम चले…
तिनका तिनका कर आशियाना है बझझझजनाया,
जोड़ जोड़ कर तब हमने खुशियों को पाया..
जिंदगी के खातों में लिख सकते हैं सब
उसे मिटा नहीं सकते
कर्म जो कर दिए उसे हटा नहीं सकते
बुरे कर्मों का फल होता है बुरा
अच्छे कर्मों को लोग याद कर जाते..
जिंदगी है एक बहीखाता
जहां सुख-दुख जिंदगी में होते  समाहित..
मंजू रात्रे (कर्नाटक)
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