यदि कोई मनुष्य शारिरिक रूप से स्वस्थ है, तब तो सब कुछ ठीक है, अगर हमारे शरीर के किसी भी अंग में कोई समस्या आ जाती है तो हमारा जीवन किसी नरक में मिलने वाली यातनाओं जैसा हो जाता है।
सच ही कहा है कि
“पहला सुख हो निरोगी काया”
“सेहत हज़ार नैमत है”
“स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है”
“If Health is gone, everything is gone”
आजकल आपने अक्सर देखा होगा की बहुत कम उम्र के लोगों को हार्ट अटैक, किडनी फेल होना, पैरालिसिस का आघात, अस्थमा, तपेदिक और डायबिटीज होना आम बात हो गई है।
कुछ साल पहले तक यह सारी बीमारियां ४० या ४५ साल के बाद होनी शुरू होती थी लेकिन अब इन बीमारियों ने किशोरों, युवाओं को भी अपनी चपेट में ले लिया है।
किसी भी कम उम्र के व्यक्ति की मृत्यु उसके सगे-संबंधियों को कितना व्यथित कर देती है इसका अंदाजा लगाना भी बहुत कठिन है।
सिद्धार्थ शुक्ला, रोहित सरदाना और पुनीत राजकुमार की मृत्यु इस भयानक सच्चाई का प्रमाण हैं।
किशोरों और युवाओं में बढ़ती हुई इन बीमारियों का कारण हमारी तेजी से बदलती हुई जीवन शैली, धूम्रपान की लत, अत्याधिक व्यायाम, स्वास्थ्य वर्धक दवाओं का अनियमित सेवन उसके मुख्य कारण हैं।
लोगों का बढ़ता हुआ मोटापा भी एक गम्भीर समस्या है, लोगों की अनियमित खान-पान की आदतों, अनियमित दिनचर्या के कारण के कारण मोटापा तेजी से स्त्री-पुरूष दोनों में फैल रहा है।
मोटापा सौ बीमारियों की जड़ है।
भारतीय जीवनशैली का तेजी से होता पाश्यात्यकरण भी एक मूल समस्या है, आज ना सिर्फ भारतीय खाने की थाली का स्वरूप बदला है बल्कि खाने का समय और खाने का ढंग दोनों ही बदल गए हैं।
भोजन में हुए इस बदलाव ने हमें बहुत सारी शारीरिक और मानसिक बीमारियों में जकड़ दिया है।
असमय ग्रहण किया हुआ भोजन हमें शारीरिक लाभ की जगह नुकसान पहुँचाता है।
बाहर होटलों में खाने के बढ़ता चलन, जंक फूड, पैक्ड फूड और मांसाहार हमारे शरीर में कई गम्भीर बीमारियों के वाहक हैं।
महानगरों और शहरों में तेजी से बढ़ता प्रदूषण मानवीय फेफड़ों को खत्म किये जा रहा है।
बच्चों के फेफड़ों पर वायु प्रदूषण के कई गंभीर दुष्प्रभाव सामने आए हैं।
शहरों में दूषित जल के सेवन से हर साल ना जाने कितने बच्चे अकाल मृत्यु की चपेट में आ जाते हैं।
नकली दवाओं का बढ़ता हुआ साम्राज्य, आज मरीजों को ठीक करने की जगह मौत की ओर ले जा रहा है।
अस्पतालों में चिकित्सा के नाम पर चल रहा व्यवसाय ग़रीब आदमी को जीते जी मार दे रहा है।
प्राचीन भारत वर्ष जो कभी ज्ञान की कल कल धारा हुआ करता था, जिन्हें हम सिर्फ ऋषि-मुनि मानते हैं वो सभी वास्तव में चिकित्सा, औषधि, शोध और वैज्ञानिक विचारों के धनी व्यक्ति थे।
उनका ज्ञान वास्तविकता के बहुत ही समीप था, भारतीयों का ज्ञान और दर्शन उस समय हर बंधन मुक्त था, प्राचीन भारत का ज्ञान का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत था, चाहे वह कला हो, शस्त्र ज्ञान हो, शास्त्र हो, चिकित्सा विज्ञान हो, औषधि विज्ञान हो, नृत्य हो या संगीत हो हर क्षेत्र में भारतीयों का योगदान अतुलनीय है।
आप भोजन के महत्व को इसी तथ्य से समझ जाएं कि भोजन के प्रकार को श्रीमदभागवत गीता में विस्तृत रूप से बताया गया है, भोजन के प्रकार और उससे होने वाले शारीरिक लाभ और विकार दोनों के बारे में बहुत ही अच्छे ढंग से बताया गया है।
श्रीमदभागवत गीता में भोजन को तीन रूपों में विभाजित किया गया है पहला तामसिक भोजन दूसरा राजसिक भोजन और तीसरा सात्विक भोजन।
आज कल कई NGO लोगों को जागरूक करने के प्रयासों में लगे हुए हैं।
आजकल अक्सर रक्तदान शिविर आपको कहीं न कहीं मिल ही जाते हैं।
लेकिन अभी भी हम अंगदान जैसे महत्वपूर्ण कार्य में बहुत पीछे हैं जिसके पीछे कई भ्रातियां जुड़ी हुई हैं।
उनमें से धार्मिक रीतिरिवाज, पारिवारिक लोगों का अंग-विच्छेदन के लिए तैयार न होना, मृत्यु पश्चात भी मृत शरीर से लगाव।
अभी हमें बहुत लम्बी लड़ाई लड़नी है;
हर व्यक्ति को स्वास्थ्य लाभ का अधिकार…
गम्भीर शारीरिक से पीड़ित को जीवन यापन के लिए आर्थिक और स्वास्थ्य सहायता …
शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति पर निर्भर लोगों को आर्थिक सहायता…
पीने के लिए स्वच्छ जल की व्यवस्था…
रक्त और अंगों की तस्करी को रोकना…
नकली दवाओं के कारोबार को रोकना…
बस इतना ही सतर्क रहें …स्वस्थ रहें
रचनाकार – अवनेश कुमार गोस्वामी
