टुकड़ा टुकड़ा, रेजा रेजा होकर भी क्या होगा,
जिसे पाना नहीं मुंकिंन उसकी यादों में खोकर भी क्या होगा।
माना कि उम्र के रास्ते बड़े कठिन हैं,
मानते हैं हम हँसकर जो न होंगे आसान ,
फिर तू ही बता हाँसिल रोकर भी क्या होगा।
हकीकत में उसका साथ इस जन्म न मिलेगा,
जो सच है साथ है चलो उसको गले लगाते,
झूठे ख्वाबों के साथ सोकर भी क्या होगा।
उसकी मुस्कुराहटें अब तन्हाइयो की साथी हैं,
महफिलें अब कहाँ वो तरन्नुम ला पाती हैं,
तबस्सुम से न कटेगी तो पलक भिगाकर भी क्या होगा।
अगर तेरे जहन में नही सफ़क्त जरा,
नही होती बुराई से घबराहट जरा,
तो कुबूल दुआ तेरी मन्दिर मस्जिद में सर झुकाकर भी क्या होगी।
रूह पर तेरी जो चढ़ गया गुनाहों का लिवास,
फिर जिस्म को न होगा पाकियत का अहसास,
जो न हुई ईमान से पाक, वो गंगाजल में नहाकर भी क्या होगी।
अन्जू दीक्षित,
उत्तर प्रदेश।
Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *