मौसम का बदला है रूख 
शीत ऋतु ने दी है दस्तक 
ठंडी ठंडी हवा है तड़पाती
हड्डियों तक को सिहराती
अंगीठी लेकर सारे हैं बैठे 
अपने अपने घरों में ही सिमटे
सर्दी ने ऐसा आतंक मचाया 
पड़ी कोहरे की रात की छाया
अलसाई सी भोर है आई
गर्म कपड़ों ने जगह बनाई
चाय की लेकर गरमाहट 
फैल कर बैठी है रजाई
दाँत लगते हैं बजने 
शरीर में मची है ठिठुरन 
दिन रैन हुए एक समान 
धूप के होते नहीं दर्शन 
कैसे झेले ठंड की चुभन 
रूकती सी लगे है धड़कन 
आग धीमे से मुस्काया 
मेरे ताप से ले लो तपन 
मिली तपन मन है हर्षाया
धीमे धीमे शरीर गरमाया 
बैठे सखी सहेलियों संग 
गर्म काॅफी बना हमसाया 
आरती झा(स्वरचित व मौलिक) 
दिल्ली 
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