सुदूर कोहरे की चादर में लिपटा लुभाता है मुझे,
वो सुन्दर शहर घाटियों के बीच नज़र आता है मुझे।
हसीं वादियों में जन्नत का बसेरा कुछ पलों का,
सुनहरे स्वप्न जैसा आकर्षित करता जाता है मुझे।
ठंडक में अहसासों की सब अधूरा रह जाता है,
धुंधला धुंधला हर नज़ारा नज़र आता है मुझे।
मद्धम किरणों से दर्द की बर्फ अंदर पिघलती है,
आवारा कोई बादल बरस भिगा जाता है मुझे।
तेज सर्द हवाओं के थपेड़ों से सिहर उठती हूँ,
तब हकीकत का ये मंज़र समझ आता है मुझे।
कैनवास पर रंगे मनमोहक दृश्य सा ये शहर,
आसपास तो कहीं भी नज़र नहीं आता है मुझे।
ओस की बूंदों सी आज ‘आस’ भी जम गयी,
रास्ता मंज़िल का अब नहीं बुलाता है मुझे।
स्वरचित
शैली भागवत ‘आस’✍️
