पोस्टकार्ड शब्द देखकर  ,फिर बचपन ने झकझोरा ,और याद आया पिताजी का कॉलेज से घर पहुंचकर ,पानी पीने के साथ साथ यह पूछना, कि कोई चिट्ठी तो नहीं आई ,और भागकर आयी हुई चिट्ठी का देना आनन्ददायक होता, दोपहर में डाकिया का इन्तजार और देखते ही हमारी कोई चिट्ठी आई है ,  और उसके हां कहने पर बहुत खुशी  अनुभव करना ,आज बहुत रोमांचकारी लग रहा है ।
  हमें किसी की शादी की खबर हो या किसी की नौकरी लगने की खबर हो या किसी की पारिवारिक समस्या ,इस सब को जाने का माध्यम चिट्ठी ही होता था और चिट्ठी से ही समाधान भी किया जाता था,
और किसी की बधाई का इंतजार भी चिट्ठियों के इंतजार से ही होता था, किसी रिश्तेदार के आने की खबर हमें चिट्ठियों से ही मिलती थी और पत्र देखकर ही पूरा परिवार उत्साहित होकर ,रिश्तेदार के स्वागत की तैयारियों में लग जाता था। कहीं-कहीं रूठने मनाने का काम भी चिट्ठियों के द्वारा ही हो जाता था।
आज टेक्नोलॉजी के कारण हर हाथ में फोन आ चुका है पर वीडियो चैट के द्वारा आमने सामने देखकर भी उस आनंद की अनुभूति नहीं होती, जो इंतजार के बाद एक पत्र को पाकर होती थी ।
उंगलियों के इशारे पर अब किसी से भी सोचने के साथ साथ बातचीत भी कर लेते हैं , पर संबंधों की उष्णता ठंडी पड़ती दिखाई दे रही है।
हर चीज का आनंद इंतजार के बाद अप्रतिम होता है और वह मन मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ता है ।आज नहीं इंतजार होता है ,किसी की चिट्ठी का ।
कोई जरूरी सरकारी कागज के लिए हम डाकिया का इंतजार करते हैं ,।
अत्र कुशलं तत्रास्तु 
से पत्र की शुरुआत करके अंत में पत्र में भूल से गलतियों के लिए माफी मांगते हुए, पत्र का जवाब शीघ्र देने का आग्रह करते थे ।
आपस के संबंधों को हम पूर्ण सम्मान देते  ।अम्मा जी(दादी )को चिट्टियां सुनाना ,और सुनाने का काम हम बच्चों का होता था और पढ़ पढ़ कर हम उनको  वह  चिट्ठियां सुनाते थे ।
आजकल के बच्चे उस सुखद  को ,अनुभव नहीं कर सकते हैं ।टीवी ना था फोन ना था,  पर था हमारे पास संयुक्त परिवार का संग और साथ साथ स्नेह और प्यार।
सजीवता से सजे हुए हमारे संस्कार एक दूसरे की कुशलक्षेम पूछते हुए हम और हमारे  रिश्तेदार ।
सम्बन्धो के रिश्ते में प्रगाढता व्याप्त रखने के लिए हमारी चिट्ठी पत्री ने अपना सम्पूर्ण समर्पण दे कर हमारे दिलों में ससम्मान शासन किया है ।
Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *