अब टूट गई वीणा की तार,
थम से गए सुर और साज,
वाणी में थी मधुरता जिनके,
मां शारदा का कंठों में वास,
कैसे सहे भारत उनकी जुदाई,
कैसे दें लता को अंतिम विदाई।
देवों के हाथों से गिरा पुष्प,
धरती पर आकर खिल गया,
जादू भरा कोमल सुरों से,
हर हृदय में रस घोल गया,
संभव नहीं इस शून्यता की भरपाई,
कैसे दें लता को अंतिम विदाई।
कौन गुनगुनाए ऐ मेरे वतन के लोगों,
कौन एक प्यार का नगमा गाये,
किससे सुने ऐ दिल-ए-नादान,
कौन जिंदगी प्यार का गीत है सुनाये,
एक आवाज़ जो फिज़ां में है छाई,
कैसे दें लता को अंतिम विदाई।
स्वरचित रचना
रंजना लता
समस्तीपुर, बिहार
