कौनऊ खेत, कौनऊ खलियान,
कृषक जीवन की, आये दासतां,
जीवन है, कृषकाय ओको,
विचरत रहत, दिन रात,
टूटी सी एक, खटैया मचैया,
परी रहत, सौवे बैठवे को,
धरा पे एक, बिछौना फटो सो,
कम्बल सोयी, ओई में परे,
सिमटे ठिठुरे, महतारी ओ,
बिटिया, गुदड़ी के लाल
होतई भुंसारौ, कुकड़ु कूँ कुकड़ु कूँ,
सुन पकड़ लई, खैतवन की गैल,
जाड़ो होवे घामऊँ, तपन सूरज की,
कोयला सों बदन, भुंज गओ सारो,
भरी दुपहरिया, आ रयी मेहरारु,
लये पोटली, चुभन घामऊँ की,
सूनी पगडंडी, चिड़ी चोंके ने बंदर भौंके,
सता रही बाकों, भरी दुपहरिया,
लायी बाँध, पुटलिया में रोटी,
अथानों आम, दो फांका प्याज,
विधाता तूने, कैसी लगा दयी,
पेट की आग, सूखो भोजन भी,
लागे छप्पन भोग, दिन देखो ने रात,
हुईये फल मीठो,
बारिश कैसी जा, मचमचा गयी,
हुयी जयी है का, खैतन में खड़ी,
मदमाती फसल, सत्यानाशी,
खाये जात है चिंता, कैसे हुईये,
जीवन बसर, जिंदगी में हमारी,
थम गयी बारिश, मुस्कान आ गयी,
पिचके पोपल, गालों पे, दूजे पल में,
छाये चेहरे पर, बादल बदहाली के,
कैसो है ये जीवन, माटी को जीवन,
पल गओ माटी में, नसीब कैसो हमारो,
पैल हती जमीदारी, भूखों मारी,
पुरखों से चाकरी, बने बँधुआ मजूर,
आज फिर गिरी, सिर पे गाज,
कौनऊ नंईयाँ, धनी धोरी हमरो,
वोट पावे आते, नेता खद्दर धारी,
हाथ जोड़त, गोड़ें परत हते,
भई ज्यौं जीत, दे दयी पीठ,
ने गाँव और, ने खेत खलियान,
ऐसै भागत फिरत, दुलत्ती झाड़त,
गायब होत ज्यौं, गधे के सिर सींग,
नशा उतर गओ, खेतीहर को,
ने नेता ने सरकार, चल रओ खेल,
बंदरबांट को ।
काव्य रचना -रजनी कटारे
जबलपुर (म. प्र.)
