सड़क के किनारे,
कूड़े के ढेर पर,
अनाज के दाने,
बिखरे पड़े हैं,
पड़ी है अमीरों की,
सड़ी हुई मानसिकता,
इन दोनों के बीच,
बैठा है एक बचपन,
अतृप्त क्षुधा से व्याकुल,
बेखबर बासीपन के दुर्गंध से,
ढूंढता है कूड़े के ढेर में,
कुछ दाने….
विकल आत्मा के लिए,
और ढूंढता है…..
खोया हुआ बचपन।
स्वरचित रचना
रंजना लता
समस्तीपुर, बिहार
