मन के एक कमरे में
बंद दरवाजे के पीछे
छुपा रखी है
मैंने
कुछ खट्टी कुछ मीठी यादें
कुछ शरारतों की
भीनी खुशबू
कुछ रेत का दरदरापन
मिट्टी से सने हाथों
के कच्चे पक्के रंग
कागज की कश्ती
के संग तैरना डूबना 
मीठे खट्टे स्वाद में
बसी बातें
गर्मी में कहानियों
वाली रातें
खुरदुरे हाथों का
नेह भरा स्पर्श
सीख भरी धीमी
चपत गाल पर
अनबन के अनोखे
किस्सों की पोटली
पल में उलझते
पल में सुलझते धागे
रंगीन रिबन से
झलकते रिश्ते
रुमाल की सिलवटों
में बसा अल्हड़पन
खोला नहीं ये दरवाजा
अब सालों से
धुंधली हो गयी दीवारें 
जालों से पटी हुई,
मन फिर भी करता है
दिन में चंद फुरसत
के पल मिले तो
इस कमरे को
फिर से सजाऊं
सुकून भरे कुछ लम्हें
यहीं पर बिताऊं।
स्वरचित
शैली भागवत ‘आस’🖍️
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