आज रश्मिरथी पटल दैनिक लेखन विषय मिला है “किस्मत का खेल” तो इस सृष्टि का अंश बनकर कोई भी ऐसा नहीं जिसने आजीवन कभी भी किस्मत के झोंकों के खट्टे- मीठे लुत्फ न उठाए हों, आइए उन नानाविध रंग बिरंगे झोंकों का मजा हम भी काव्य के माध्यम से लेते हैं। वैसे इनसे तो हम आप भी बरी नहीं हैं क्योंकि इनका स्वाद देने वाला तो हमारा पालक,पोषक और संहार एक ही नियन्ता है।उसकी पहुँच से बाहर कौन हो सकता है? अर्थात कोई नहीं, यही शाश्वत सत्य है।
किस्मत की जो चले बयार,
पा सके न कोई उससे पार।
अजब-गजब है ये खेल दिखाती,
जाने कब औ कहाँ-कहाँ लेजाती,
कौन – कौन से डगर दिखाती ,
कभी ऊपर कभी नीचे लाती,
किस्मत के झूले की डोर, 
पकड़कर सिरजनहार झुलाए 
कभी हौले कभी तेज झोंक दिलाए।
कभी स्वप्न कभी सच्चा लागे,
कभी मधुरस कभी तीखा लागे।
भांति-भांति के दृश्य दिखाए,
अद्भुत खेल वो नित्य रचाए।
विधि का विधान को टारन वाला,
विधाता करे जो, सोइ होने वाला।
उलट-पलट मति फिरि-फिरि जाए,
है न कोइ जुगत जो बचावन आए।
खेवत वही है किस्मत की नौका, 
जो मनुज-तन हित दीन्हा मौका।
पल में राजा रंक बन जावे, 
पल में रंक सिंहासन पावे।
अद्भुत मायाजाल की दुनिया,
उलझ उलझ रह जाए गुनिया।
उर्वरा को बंजर कर देती,
मरुस्थल में हरियाली लाती,
कभी सपनों को पंख लगाती,
कभी आसमान से है टपकाती।
ऐसी है किस्मत की पिटारी, 
खुल जाए तो वारी न्यारी,
बंद हुई तो कोठरी कारी ।
खेल-खेल में महल बनाती,
पलक झपकते धूल चटाती।
ज्यादा मोह माया न करना,
किस्मत से न पंगा लेना।
कर्म-पथ पर चलते रहना,
इक दिन किस्मत बनेगी गहना।।
रचयिता – 
       सुषमा श्रीवास्तव 
        मौलिक रचना
       सर्वाधिकार सुरक्षित 
        उत्तराखंड। 
 
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